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“जब मौला अली अ.स. की याद में मुस्कुराया शहर: विलादत – ए – मौला अली अ.स. पर रुड़की में बंटा मोहब्बत का लंगर..

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पंच👊नामा
रुड़की: शनिवार की दोपहर रुड़की की सड़कों पर कुछ अलग सा सुकून रहा। मुक़द्दस माह रजब की 13वीं तारीख़ थी—वह दिन जब इंसाफ़, सब्र और इंसानियत के अलमबरदार मौलाए कायनात हज़रत अली अ.स. दुनिया में तशरीफ़ लाए। शहर के माहौल में कोई शोर नहीं, कोई दिखावा नहीं—बस अकीदत थी, ख़ामोश मोहब्बत थी और ख़िदमत का जज़्बा था, जो हर चेहरे पर नज़र आ रहा था।रामपुर रोड स्थित उमर एन्क्लेव कॉलोनी के बाहर लगे आम लंगर ने इस एहसास को और गहरा कर दिया। कतार में खड़े लोग एक-दूसरे से मज़हब या पहचान नहीं पूछ रहे थे—हर हाथ में बस एक प्लेट थी और हर दिल में बराबरी का एहसास। राजमा-चावल और गाजर के हलवे की ख़ुशबू के साथ जो चीज़ सबसे ज़्यादा महसूस हो रही थी, वह थी अपनापन।अंजुमन ग़ुलामाने मुस्तफ़ा ﷺ सोसाइटी (रजि.), रुड़की चैप्टर की यह पहल सिर्फ़ एक धार्मिक रस्म नहीं थी, बल्कि मौला अली अ.स. की उस सोच को ज़मीन पर उतारने की कोशिश थी, जिसमें इंसान की पहचान उसका अमल होती है। मौला अली अ.स. का वह पैग़ाम बार-बार ज़हन में गूंजता रहा—मज़लूम के साथ खड़े रहो और ज़ुल्म के सामने झुकने से इनकार कर दो।अंजुमन के सेक्रेटरी कुंवर शाहिद कहते हैं कि इस लंगर का मक़सद पेट भरना नहीं, दिल जोड़ना है। उनके मुताबिक मौला अली अ.स. की सीरत आज भी समाज को रास्ता दिखा सकती है, अगर हम उसे ज़िंदगी में उतार लें। दोपहर 12 बजे शुरू हुआ यह आयोजन पूरी तरह सादगी, अनुशासन और अमन के माहौल में सम्पन्न हुआ।इस जश्न को मुकम्मल बनाने में राशिद अहमद, अमजद अली, सुहैल खान, हैदर उर्फ़ आसिफ अली, साहिल मलिक, साक़िब शहज़ाद, आदिल गौर, परवेज़ आलम, शाहनवाज कुरैशी, गौरव बंसल, रामपाल सिंह, बिलाल खान, मेहरबान अली, अनस ग़ाज़ी समेत कई हाथ जुड़े। शायद यही मौला अली अ.स. की सबसे बड़ी सीख है—जहाँ लोग जुड़ते हैं, वहीं इंसानियत ज़िंदा रहती है।

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