हरिद्वार

“मोहम्मद दीपक से लेकर मुस्लिम पत्रकार के लिए छलकते हिंदू पत्रकार साथी के आँसू — नफ़रत पर भारी इंसानियत..

इतिहास गढ़ती गंगा-जमुनी तहज़ीब की ये दो तस्वीरें, नफ़रत के दौर में इंसानियत की जीत..

खबर को सुनें

पंच👊नामा
रुड़की: देश के मौजूदा दौर में जब नफ़रत, धार्मिक उन्माद और ज़हरीली बयानबाज़ी का शोर हर तरफ़ सुनाई देता है, उसी बीच इंसानियत और आपसी भाईचारे की कुछ तस्वीरें ऐसी भी हैं जो दिल को सुकून देती हैं और यह भरोसा ज़िंदा रखती हैं कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब अभी मरी नहीं है। जहाँ कुछ लोग धर्म के नाम पर सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में जुटे हैं, वहीं अमनपसंद लोग आज भी इस मुल्क की रूह को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं।सोशल मीडिया आजकल धर्म के नाम पर पोस्ट, बहस, विवाद और उकसावे का बड़ा मंच बनता जा रहा है। हर दिन कोई न कोई मामला सामने आता है, लेकिन इन्हीं ज़हरीली हवाओं के बीच भाईचारे की ठंडी बयार भी चल रही है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हाल के दिनों में कोटद्वार से सामने आया “मोहम्मद दीपक” का मामला इसी इंसानियत की मिसाल है, जहाँ एक हिंदू युवक ने नफ़रत के आगे झुकने से इनकार कर दिया। एक तरफ़ सोशल मीडिया पर उसकी बहादुरी और इंसानियत की पैरोकारी की तारीफ़ हो रही है, तो दूसरी तरफ़ कुछ लोग इसे भी धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं।इसी कड़ी में बीते दिन रुड़की से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने कई सवालों के जवाब अपने आप दे दिए। चार दशकों तक बेबाक, निर्भीक और ईमानदार पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राव शाहनवाज ख़ां के निधन के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा ने नफ़रत की राजनीति पर करारा कटाक्ष किया। इस सभा का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार सुभाष सैनी और तपन सुशील ने किया, जहाँ धर्म की दीवारें टूटती नज़र आईं।श्रद्धांजलि सभा में पहुँचने वालों में अधिकांश गैर-मुस्लिम पत्रकार और जिम्मेदार नागरिक शामिल थे। मंच पर कोई भाषण नहीं, कोई नारा नहीं—बस एक साथी के बिछड़ जाने का ग़म था। दृश्य ऐसा था कि अनुभवी पत्रकार अपने आंसू नहीं रोक पाए, फूट-फूटकर रोते साथी यह बता रहे थे कि रिश्ता धर्म का नहीं, इंसानियत और पेशे का था। यह साफ़ संदेश था कि स्याही, कलम और सच का कोई मज़हब नहीं होता।इतिहास गवाह है कि हिंदुस्तान की मिट्टी ने हमेशा मोहब्बत को सींचा है। आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी और मौलाना आज़ाद से लेकर भगत सिंह और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां तक, इस देश ने बार-बार दिखाया कि मज़हब नहीं, मुल्क पहले आता है। गंगा-जमुनी तहज़ीब केवल एक जुमला नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही वह सोच है जिसने हिंदुस्तान को जोड़े रखा है।राव शाहनवाज ख़ां की श्रद्धांजलि सभा उसी इतिहास की एक जीवंत झलक थी। यह उन लोगों के लिए भी जवाब थी जो हर दुख, हर खुशी और हर रिश्ते को धर्म के तराज़ू में तौलना चाहते हैं। यह तस्वीर बता रही थी कि चाहे माहौल कितना भी नफ़रती क्यों न हो जाए, इंसानियत अब भी ज़िंदा है—बस उसे देखने की नीयत चाहिए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!