“वंदे मातरम सर्कुलर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद का ऐतराज: अनुच्छेद 25 के खिलाफ बताया, धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरे की जताई आशंका..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार: केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी सर्कुलर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है। संगठन ने सरकार से सर्कुलर की तत्काल समीक्षा की मांग की है।
जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे में किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत किसी कविता या छंद का पाठ करने के लिए बाध्य करना असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम’ के मूल पाठ के कुछ छंदों में मूर्ति वंदना और देवी-देवताओं का उल्लेख है, जबकि इस्लाम में तौहीद के सिद्धांत के तहत अल्लाह के अलावा किसी अन्य की इबादत स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीअत इस कविता के विरोध में नहीं है और जो लोग इसका पाठ करना चाहते हैं, उन्हें पूरा अधिकार है, लेकिन इसे अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक के समान होगा। उन्होंने भारत की बहुलतावादी परंपरा और ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धांत को राष्ट्रीय एकता का आधार बताया।
वहीं, जमीअत उलमा उत्तराखंड के सदर एवं मदरसा अरबिया दारुल उलूम रशीदिया, ज्वालापुर (हरिद्वार) के मोहतमिम मौलाना मोहम्मद आरिफ ने टीवी रिपोर्टर से बातचीत में कहा कि देशप्रेम हर नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन किसी भी धार्मिक मान्यता के विरुद्ध कोई कार्य स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरकार से संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक सौहार्द को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेने की अपील की।



