मदन कौशिक, धन सिंह और त्रिवेंद्र रावत पर भड़के तीर्थ पुरोहित….
काले झंडे दिखाकर सुनाई खरी खोटी,,जोर पकड़ा देवस्थानम बोर्ड का विरोध..
पंच 👊 नामा ब्यूरो
देहरादून: देवस्थानम बोर्ड के मुद्दे पर सोमवार को कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक व पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को तीर्थ पुरोहितों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। पुरोहितों ने काले झंडे दिखाकर “वापस जाओ-वापस जाओ के नारे लगाए। इसके बाद गुस्साए पुरोहितों ने उन्हें घेर लिया। जिससे पुलिस प्रशासन के हाथ पांव फूल गए। देवस्थानम बोर्ड बनाने का विरोध कर रहे तीर्थ पुरोहितों ने उन्हें दर्शन के लिए नहीं जाने दिया। हालांकि पुलिस के दखल ल बाद तीनों नेताओं को दर्शन करा दिए गए।
वहीं, गंगोत्री में भी सोमवार को देवस्थानम बोर्ड के विरोध में बाजार पूर्ण रूप से बंद रखा गया। इतना ही नहीं, यात्रियों को गंगा जल लेकर जाने के लिए बर्तन तक नहीं मिल पाए।
गंगोत्री मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने कहा कि देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को रद्द करने के बजाय सरकार अब तीर्थ पुरोहितों को भ्रमित कर रही है। उन्होंने कहा कि तीर्थ पुरोहितों की जब 11 सितंबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात हुई थी तो उस बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आश्वासन दिया था कि 30 अक्टूबर तक देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया जाएगा। लेकिन, तय तिथि पर सरकार की ओर से देवस्थानम को भंग करने को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की गई। सरकार की इस वादा खिलाफी को लेकर तीर्थ पुरोहितों और गंगोत्री धाम के व्यापारियों ने सामूहिक रूप से विरोध किया जा रहा है।
आखिर क्या है देवस्थानम बोर्ड….
उत्तराखंड सरकार ने साल 2019 में विश्व विख्यात चारधाम समेत प्रदेश के अन्य 51 मंदिरों को एक बोर्ड के अधीन लाने को लेकर उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड का गठन किया. बोर्ड के गठन के बाद से ही लगातार धामों से जुड़े तीर्थ पुरोहित और हक-हकूकधारी इसका विरोध कर रहे हैं. बावजूद इसके तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तीर्थ पुरोहितों के विरोध को दरकिनार करते हुए चारधाम देवस्थानम बोर्ड को लागू किया।
साल 1939 से साल 2020 बदरी-केदार मंदिर समिति का अधिनियम चल रहा था, लेकिन यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के लिए कोई अधिनियम नहीं था. इस वजह से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की यात्रा के संचालन के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ती थी. लेकिन उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड प्रभावी होने के बाद से ही चारों धाम समेत 51 मंदिर एक बोर्ड के अधीन आ गए और 80 साल से चली रही बदरी-केदार मंदिर समिति की परम्परा समाप्त हो गयी।
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बोर्ड गठन को लेकर कब-कब क्या हुआ….
साल 2017 में बीजेपी सत्ता में आई. इसके बाद वैष्णो देवी और तिरुपति बालाजी बोर्ड की तर्ज पर यहां भी चारधाम के लिए बोर्ड बनाने की कसरत हुई. चारधाम समेत प्रदेश के 51 मंदिरों को एक बोर्ड के अधीन लाने को लेकर साल 2019 में प्रस्ताव तैयार किया गया था. 27 नवंबर 2019 को सचिवालय में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में जम्मू-कश्मीर में बने श्राइन एक्ट की तर्ज पर उत्तराखंड चारधाम बोर्ड विधेयक-2019 को मंजूरी दी गयी.