हरिद्वार

“चार दशकों की बेबाक पत्रकारिता का अंत: राव शाहनवाज खां के साथ एक युग ने ली विदाई, नम आंखों से किए गए सुपुर्दे खाक..

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पंच👊नामा
प्रवेज़ आलम, रुड़की: रुड़की की पत्रकारिता आज एक ऐसे साये से महरूम हो गई, जिसने चार दशकों से भी ज़्यादा वक्त तक सच, साहस और सिद्धांतों की मशाल थामे रखी। ढंढेरा निवासी वरिष्ठ पत्रकार राव शाहनवाज खां अब इस दुनिया-ए-फ़ानी में नहीं रहे। देहरादून के हिमालयन अस्पताल, जौलीग्रांट में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके पैतृक गांव ढंढेरा के कब्रिस्तान में नम आंखों के साथ उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।रुड़की शहर की पत्रकारिता का एक मजबूत किला आज ढह गया। दैनिक बद्रीविशाल, दैनिक जागरण, हिमाचल टाइम्स, प्रधान टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में अपनी सेवाएं देकर राव शाहनवाज खां ने पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि इबादत की तरह जिया। बीते करीब दस वर्षों से वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन जज़्बा, हौसला और कलम की धार आख़िरी वक्त तक कम नहीं हुई।राव साहब अपनी निर्भीक, पक्की और सच्ची पत्रकारिता के लिए पहचाने जाते थे। निडर अंदाज़, बेबाक जुबान और जिद्दी तेवर उनके व्यक्तित्व की पहचान थे। क्राइम और राजनीति की रिपोर्टिंग में उन्हें महारत हासिल थी। खोजी पत्रकारिता हो या सत्ता से सवाल करने का साहस—राव शाहनवाज खां ने कभी समझौते का रास्ता नहीं चुना। वक्फ बोर्ड से जुड़ी बारीक जानकारियों के चलते उन्हें लोग मज़ाकिया लहजे में “वक्फ बोर्ड की डिक्शनरी” तक कहा करते थे, लेकिन यह उनके ज्ञान और अनुभव का ही प्रमाण था।राव शाहनवाज खां उन गिने-चुने पत्रकारों में शुमार थे, जिन्होंने पत्रकारिता के हर दौर को बहुत नज़दीक से देखा और जिया। वह समय भी उन्होंने देखा जब खबरें काग़ज़ पर लिखी जाती थीं, लिफ़ाफ़े में बंद होकर दफ़्तरों तक भेजी जाती थीं और एक-एक शब्द की अहमियत जान परख कर तय होती थी। कलम और दवात से शुरू हुआ उनका यह सफ़र समय के साथ बदला, लेकिन उनकी सोच नहीं बदली।आधुनिक दौर में एंड्रॉयड मोबाइल फोन, कम्प्यूटर और ई-मेल के ज़रिये खबर भेजने वाली तेज़ रफ्तार पत्रकारिता को भी उन्होंने उसी संजीदगी और ज़िम्मेदारी के साथ अपनाया। तकनीक बदली, माध्यम बदले, लेकिन राव साहब के लिए खबर का मूल—सच और ईमानदारी—हमेशा सर्वोपरि रहा।राव साहब सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों के लिए रहनुमा थे। युवा पत्रकारों को तराशना, उन्हें हौसला देना और स्थापित करने में मदद करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। उनकी डांट में भी सीख होती थी और उनकी मुस्कान में अपनापन।वरिष्ठ पत्रकार सुभाष सैनी, तपन सुशील, अफजल मंगलौरी, एम. हसीन, अहमद भारती, एन.ए. पुंडीर, चौ. अनवर राणा, साजिद इरशाद, अख्तर मलिक, अनिल पुंडीर सहित कई साथियों ने राव साहब से जुड़ी यादों को साझा करते हुए उनकी निडरता, ईमानदारी और पत्रकारिता में दिए गए अमूल्य योगदान को भावुक शब्दों में याद किया।राव शाहनवाज खां की अंतिम यात्रा में पत्रकार दीपक मिश्रा, मुनव्वर अली साबरी, प्रवेज़ आलम, रियाज कुरैशी, सुभाष सक्सेना, आरिफ नियाज़ी, अमजद भारती, असलम अंसारी, दीपक शर्मा, ईश्वर चंद के साथ-साथ राव आफाक अली, राव शेर मोहम्मद, राव अफजल (चेयरमैन), उदय पुंडीर समेत राजनीतिक, सामाजिक और जिम्मेदार हस्तियों की बड़ी मौजूदगी रही।

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