उत्तराखंड

“सारे थाने बन गए कोतवाली, हर जगह इंस्पेक्टर संभालेंगे कमान तो दारोगा क्या पर्चे काटेंगे खाली.?? उठे सवाल..

प्रदेश में थानों के उच्चीकरण के चलते तीन हजार दारोगाओं के भविष्य पर संकट, बिगड़ जाएगी व्यवस्था..

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पंच👊नामा-ब्यूरो
उत्तराखंड: उत्तराखंड में थानों के लगातार हो रहे उच्चीकरण ने पुलिस व्यवस्था को काग़ज़ों में आधुनिक जरूर बना दिया है, लेकिन अब यह प्रक्रिया पूरे प्रदेश की पुलिस नीति को कटघरे में खड़ा कर रही है। सवाल सिर्फ किसी एक जिले का नहीं, सवाल प्रदेश भर में तैनात उन करीब 3000 दरोगाओं के भविष्य का है, जिनकी भूमिका इस नई व्यवस्था में लगातार सिमटती जा रही है।प्रदेश के अधिकतर थाने अब कोतवाली बन चुके हैं। हर कोतवाली की कमान इंस्पेक्टर के हाथ में जा रही है। नतीजा यह कि दारोगा संवर्ग के सामने पहचान और जिम्मेदारी का संकट खड़ा हो गया है।2000–15 और 2016 बैच पर सबसे बड़ा असर….
सबसे ज्यादा असर 2000–15 और 2016 बैच के दरोगाओं पर पड़ रहा है। मौजूदा प्रमोशन ढांचे के तहत इन अधिकारियों को इंस्पेक्टर बनने में कम से कम 10 साल और लगेंगे। यानी अगले एक दशक तक वे नेतृत्व, थाना प्रभारी या निर्णय लेने वाली भूमिका से लगभग बाहर रहेंगे।सवाल गृह विभाग से—क्या 10 साल तक दरोगा सिर्फ पर्चे काटते रहेंगे..?
अब सवाल सीधे गृह विभाग से है – क्या सरकार की नीति यही है कि अनुभवी दरोगा अगले 10 साल तक सिर्फ विवेचना, पंचनामा और कागजी कार्रवाई तक सीमित रहें..? क्या फील्ड पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण और वर्षों का अनुभव सिर्फ पद न होने की वजह से नजरअंदाज कर दिया जाएगा?डीजीपी कार्यालय से भी जवाब जरूरी…..
यह सवाल डीजीपी कार्यालय से भी टकराता है। क्या पुलिस नेतृत्व के पास कोई स्पष्ट रोडमैप है कि उच्चीकरण के बाद दारोगा संवर्ग की भूमिका क्या होगी.? या फिर यह मान लिया गया है कि थाना चलाना केवल इंस्पेक्टर का काम है और दारोगा सिर्फ सहायक भूमिका में रहेंगे?पद बनाम अनुभव: किसे तरजीह..?
जानकार मानते हैं कि यह संकट सिर्फ प्रमोशन का नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की सोच का है। अगर हर समस्या का हल सिर्फ पद बढ़ाने और बोर्ड बदलने से हो जाता, तो अनुभव, मेहनत और ज़मीनी पकड़ की जरूरत ही क्या थी..?नीति बनी, लेकिन संवर्ग छूट गया…?
थानों के उच्चीकरण की नीति बनाते समय यह सवाल क्यों नहीं सोचा गया कि, 3000 दरोगाओं को सिस्टम में कैसे समायोजित किया जाएगा..? उन्हें जिम्मेदारी और नेतृत्व का अवसर कब मिलेगा..? और 10 साल का यह खाली अंतराल कौन भरेगा..?कप्तान का विवेक और पुराना फार्मूला……
पूर्व में भी ऐसे कई मौके आए हैं जब पुलिस कप्तान ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए थानों में इंस्पेक्टर और कोतवाली जैसे बड़े क्षेत्रों में अनुभवी दारोगाओं को तैनात किया। नतीजा—कानून व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त, अपराध पर नियंत्रण और पुलिसिंग में संतुलन। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह फैसला अब ज़िले तक सीमित न रहकर “ऊपर के सिस्टम” से संचालित होने लगा है, जहां कप्तान के अधिकार भी सिमटते नजर आ रहे हैं।अब सवाल टालना मुश्किल….
आज स्थिति यह है कि प्रदेश की पुलिस व्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह मामला अब सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं रहा। अब सवाल गृह विभाग की नीतियों और डीजीपी की प्रशासनिक दृष्टि दोनों पर है। क्या 3000 दरोगाओं का भविष्य यूं ही अधर में छोड़ दिया जाएगा, या कोई ठोस नीति सामने आएगी…?

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