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“देहरादून के तत्कालीन एसएसपी जनमेजय खंडूड़ी के खिलाफ पुलिस शिकायत प्राधिकरण के आदेश पर उठे अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल..

बेनामी संपत्ति के संदेह में चल रही थी जांच, सिविल विवाद के कारण तुरंत दर्ज नहीं हुई एफआईआर..

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पंच👊नामा-ब्यूरो
देहरादून की सुभाषनगर, क्लेमनटाउन स्थित एक विवादित संपत्ति को लेकर सामने आया प्रकरण इन दिनों चर्चा में है। तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) आईपीएस जनमेजय खंडूड़ी के खिलाफ पुलिस शिकायत प्राधिकरण के आदेश के बाद विभिन्न समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में कई तरह की खबरें प्रकाशित हो रही हैं। हालांकि मामले से जुड़े तथ्यों पर नजर डालें तो यह प्रकरण मूल रूप से सिविल प्रकृति और कथित बेनामी संपत्ति के विवाद से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसके चलते पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई।जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता कुसुम कपूर स्वयं को मोहेन्द्र मलिक की भांजी बताती हैं। विवादित संपत्ति सुभाषनगर क्षेत्र की है, जिसे वर्ष 1997 में मोहेन्द्र मलिक ने खरीदा था। बताया जाता है कि मोहेन्द्र मलिक ब्रिटिश नागरिक हैं और उनकी पत्नी जर्मन नागरिक हैं। ऐसे में यह सवाल भी सामने आया कि विदेशी नागरिकों द्वारा इस प्रकार जमीन और मकान की खरीद किस प्रक्रिया के तहत की गई।जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि इस संपत्ति से जुड़ी वसीयत रामभरोसे द्वारा वर्ष 1964 की रजिस्ट्री के आधार पर अमित यादव के नाम की गई थी। बाद में अमित यादव ने सिविल न्यायालय में वाद दायर किया। सिविल न्यायालय ने सुनवाई के बाद मोहेन्द्र मलिक की रजिस्ट्री को निरस्त कर दिया और राजस्व अभिलेखों में संपत्ति रामभरोसे और अमित यादव के नाम दर्ज होने की जानकारी मिली।संपत्ति के कब्जे को लेकर भी विवाद की स्थिति सामने आई। शिकायतकर्ता कुसुम कपूर और उनके पति बी.के. कपूर संपत्ति के एक हिस्से में कब्जे में बताए गए, जबकि दूसरे हिस्से में मोना रंधावा का कब्जा बताया गया। इस संबंध में बी.के. कपूर ने मोना रंधावा के खिलाफ सिविल न्यायालय में वाद दायर कर रखा है। वहीं मोना रंधावा ने न्यायालय में अपने कब्जे वाले हिस्से को अमित यादव के पक्ष में देने की जानकारी दी है।मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी बताया जा रहा है कि कुसुम कपूर और मोना रंधावा दोनों ही मोहेन्द्र मलिक को अपना मामा बताती हैं, जबकि दोनों आपस में भाभी बताई जाती हैं। इन परिस्थितियों में प्रथम दृष्टया पूरा प्रकरण संपत्ति के स्वामित्व, कब्जे और कथित बेनामी लेनदेन से जुड़ा सिविल विवाद प्रतीत हुआ। पुलिस स्तर पर मामले की वास्तविकता और दस्तावेजों की जांच की जा रही थी, जिसके चलते एफआईआर दर्ज करने में समय लगा।कानूनी जानकारों के अनुसार जब किसी मामले में संपत्ति स्वामित्व, वसीयत और कब्जे को लेकर सिविल न्यायालय में वाद लंबित हो, तब पुलिस द्वारा सीधे आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले तथ्यों की गहन जांच करना आवश्यक माना जाता है। यही कारण बताया जा रहा है कि इस प्रकरण में तत्कालीन एसएसपी जनमेजय खंडूड़ी के कार्यकाल में एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई।इस बीच पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने उत्तराखंड पुलिस अधिनियम की धारा 71(1)(क) के तहत मामले की जांच करते हुए आदेश पारित किया है। इस धारा के अनुसार राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और उससे उच्च पदस्थ अधिकारियों के विरुद्ध कुछ विशिष्ट मामलों में जांच करता है। इनमें पुलिस हिरासत में मृत्यु, गंभीर चोट, बलात्कार या प्रयास, विधिक प्रक्रिया के बिना गिरफ्तारी या नजरबंदी, मानवाधिकार उल्लंघन और भ्रष्टाचार जैसी शिकायतें शामिल हैं।ऐसे में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि जब पूरा मामला सिविल प्रकृति और संपत्ति विवाद से जुड़ा था, तब केवल एफआईआर में देरी की शिकायत को पुलिस शिकायत प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में कैसे माना गया। साथ ही यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि उपरोक्त प्रावधानों में से किस आधार पर तत्कालीन एसएसपी को गंभीर अवचार का दोषी माना गया।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी प्रकरण में सिविल विवाद और कथित बेनामी संपत्ति का पहलू प्रमुख हो, तो पुलिस द्वारा जल्दबाजी में आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के बजाय तथ्यों की जांच करना ही विधिसम्मत और न्यायसंगत प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसे में इस पूरे प्रकरण को लेकर अधिकार क्षेत्र और तथ्यात्मक स्थिति पर बहस जारी है।

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