उत्तराखंड

“अचानक बंद हुआ राष्ट्रीय सहारा अखबार, एक झटके में बेरोजगार हुए उत्तराखंड के सैकड़ों पत्रकार..

दशकों से अखबार के साथ जुड़े पत्रकार हुए बे-सहारा, भविष्य अधर में, कौन बनेगा सहारा..

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पंच👊नामा-ब्यूरो
देहरादून: उत्तराखंड की मीडिया दुनिया के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। राष्ट्रीय सहारा का देहरादून संस्करण गुरुवार देर रात अचानक बंद हो गया। बिना किसी पूर्व सूचना के मैनेजमेंट ने कर्मचारियों को फोन कर साफ कह दिया कि वे अब काम पर न आएं। इसके बावजूद शुक्रवार सुबह पत्रकार और कर्मचारी कार्यालय पहुंचे, रिपोर्टरों ने खबरें लिखीं और सब-एडिटरों ने पेज भी बनाए, लेकिन अखबार प्रेस से बाहर नहीं आया।सूत्रों के अनुसार, देहरादून एडिशन के बंद होने से सैकड़ों पत्रकार और कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। हालात उस समय और गंभीर हो गए, जब मैनेजमेंट ने प्रेस कर्मचारियों को धमकाते हुए सभी पत्रकारों से इस्तीफा मांग लिया। बदले में चार महीने का वेतन देने का आश्वासन दिया गया है, लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि यह राशि भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर बताई जा रही है।पत्रकारों का आरोप है कि पहले से ही लाखों रुपये का वेतन बकाया है, जिसकी कोई ठोस समय-सीमा नहीं बताई गई। अचानक लिए गए इस फैसले से कर्मचारियों में आक्रोश और असमंजस का माहौल है।मीडिया जानकारों के मुताबिक राष्ट्रीय सहारा का यह अंत अप्रत्याशित नहीं था। वर्ष 2014 से ही समूह की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई थी। सहाराश्री के जेल जाने के बाद संस्थान की रीढ़ टूट गई और प्रबंधन स्तर पर हालात संभलने के बजाय और बिगड़ते चले गए।वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि टाइटेनिक जैसे विशाल संस्थान के डूबने में वक्त जरूर लगा, लेकिन अंदर से वह कब का खोखला हो चुका था। आरोप है कि बाद के वर्षों में शीर्ष प्रबंधन में शामिल कुछ लोगों ने संस्थान को बचाने के बजाय अपने निजी हितों को प्राथमिकता दी, जिससे हालात और बदतर होते चले गए।देहरादून संस्करण का बंद होना केवल एक अखबार का बंद होना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पत्रकारिता के लिए एक कड़वा अध्याय माना जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कर्मचारियों के भविष्य और उनके मेहनताना की जिम्मेदारी से प्रबंधन ऐसे ही पल्ला झाड़ लेगा। फिलहाल, राष्ट्रीय सहारा के बंद हुए देहरादून संस्करण के पत्रकार और कर्मचारी अपने अधिकारों और बकाया वेतन को लेकर आगे की रणनीति बनाने में जुटे हैं।

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