“एक ही कुर्सी पर “धुआं, धमाका और भूचाल, अब राजधानी चले धुरंधर कोतवाल..
इंस्पेक्टरों ने कसकर बांधी पेटियां, धरती पर जमा दी एड़ियां, बदलता मौसम हिलायेगा छोटी-बड़ी कुर्सियां..

पंच👊नामा-ब्यूरो
बस और ट्रेन में सीट को लेकर मारामारी होने पर आज भी देहात से शहर आए हुए लोग खिड़की के रास्ते सीट पर रुमाल रखकर अपनी जगह पक्की कर लेते हैं। मुख्य दरवाजे से सवार होने वाले यात्री सीट पर रुमाल रखा देख ये समझ जाते हैं कि सीट रिजर्व हो चुकी है।
एक चर्चित कोतवाल के ऐसे ही पैंतरे ने पड़ोसी जिले के इंस्पेक्टरों में हलचल मचा दी है। कई इंस्पेक्टरों ने कसकर पेटियां बांधनी शुरू कर दी है, कुछ ने पूरी ताकत लगाकर धरती पर एड़ियां जमा दी हैं। दरअसल, धुरंधर कोतवाल ने एक ही कुर्सी पर तीन कैलेंडर पुराने कर डाले।
कितना भी “धुंआ, धमाका और भूचाल मचा हो, मजाल है कि कोतवाल ने कुर्सी बदली हो। फिर फरमान चाहे डीजीपी का ही क्यों न रहा हो। अब ऐसा क्या हुआ कि अचानक कोतवाल साहब के फोन में विदाई की धुन बजने लगी।
“पंच👊नामा…. के अंडर कवर खबरी “लल्लन चतुर्वेदी” बताते हैं कि कई दिन से मौसम बदल रहा है, दो दिन पहले तो ओलावृष्टि भी हुई। धुरंधर कोतवाल बड़े वाले मौसम विज्ञानी भी हैं, इसलिए मौसम की बदलती करवट में उन्हें दूर से छोटी-बड़ी कुर्सियां हिलती नजर आ रही हैं।
इसलिये धुरंधर कोतवाल ने भी अंगड़ाई ली और हाथ लंबा करते हुए राजधानी में गमछा रखवा दिया है। अब देहाती स्टाइल में गमछा रख दिया तो समझो सीट पक्की।
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आधे जिले की कुर्सियां जद में…..
इंस्पेक्टरों की बेचैनी का कारण केवल एक सीट का रिजर्व होना नहीं है। समस्या ये है कि धुरंधर एक सीट पर तशरीफ़ रखते हैं, उनके पांव दूसरी कुर्सी पर टिकते हैं। तीसरी कुर्सी पर कुहनी रखकर स्टाइल मारते हैं और चौथी कुर्सी पर कैप और डंडा रखते हैं। कुल मिलाकर जिले की आधी कुर्सियां धुरंधर कोतवाल की चपेट में।
थोड़ा कमर सीधा करने का मन हुआ तो पांव दूसरे जिले की कुर्सियों तक जा पहुंचते हैं। अब काबलियत का अंदाजा तो आप लगा ही चुके होंगे। बड़े-बड़े साहब इनकी कला के कद्रदान हैं। अब देखने वाली बात यह है कि बड़े अधिकारियों की भीड़ में धुरंधर अपनी कला का कितना प्रदर्शन कर पाते हैं।
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