उत्तराखंडहरिद्वार

“देहरादून-उधमसिंहनगर में चार-चार, नैनीताल में तीन तो हरिद्वार जिले में दारोगाओं के लिए केवल एक थाना क्यों..??

प्रदेश भर में थानों के उच्चीकरण के चक्कर में गड़बड़ा रही व्यवस्था, दारोगाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को समेटने का कुचक्र..

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पंच👊नामा-ब्यूरो
देहरादून: पुलिस की व्यवस्था में सिपाही से लेकर आला अधिकारियों तक हर स्तर की भूमिका अपनी जगह अहम होती है। सिपाही जमीनी हकीकत से रूबरू होता है, दारोगा विवेचना और कानून-व्यवस्था की धुरी होता है, जबकि इंस्पेक्टर और वरिष्ठ अधिकारी पूरे सिस्टम को दिशा देते हैं। लेकिन उत्तराखंड में थानों के कोतवाली में उच्चीकरण की मौजूदा कवायद ने इस संतुलन को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।नई व्यवस्था में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दारोगाओं की भूमिका को व्यवस्थित करने के बजाय उसे सीमित करने की पटकथा लिखी जा रही है। हैरानी इस बात की है कि यह प्रयोग पूरे प्रदेश में एक जैसा नहीं है। राजधानी देहरादून और उधमसिंहनगर में दारोगाओं के लिए चार-चार थाने छोड़े गए हैं, नैनीताल में तीन थाने हैं, लेकिन हरिद्वार जैसे बड़े और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में दारोगाओं के हिस्से में केवल एक थाना ही रखा गया है।यह असमानता महज संख्या की नहीं है, बल्कि पुलिसिंग के ढांचे पर सीधा असर डालने वाली व्यवस्था बनती जा रही है। एक ओर कुछ जिलों में दारोगाओं को अपेक्षाकृत व्यापक दायरा मिल रहा है, वहीं हरिद्वार में यह दायरा बेहद संकुचित कर दिया गया है। इससे न केवल विवेचनाओं का भार बढ़ने की आशंका है, बल्कि जिम्मेदारियों का संतुलन भी बिगड़ता नजर आ रहा है।
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कप्तानों के विवेकाधिकार पर अतिक्रमण…..पुलिस महकमे के भीतर इस बात को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं कि थानों के उच्चीकरण के नाम पर जिलों के पुलिस कप्तानों के विवेकाधिकार में अतिक्रमण किया गया है। परंपरागत रूप से किसी जिले की भौगोलिक, सामाजिक और अपराध संबंधी जरूरतों को देखते हुए थानों की संरचना तय करने का अधिकार पुलिस कप्तान के पास होता रहा है। लेकिन अब फैसले ऊपर से तय कर जिलों पर लागू किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पुलिसिंग करने की गुंजाइश लगातार घटती जा रही है। नतीजा यह है कि थानों के नाम बदल गए, रैंक की संरचना भी बदल गई, लेकिन जमीनी पुलिसिंग को मजबूत करने के बजाय भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रशासनिक प्रयोग है या फिर दारोगाओं की केंद्रीय भूमिका को धीरे-धीरे हाशिये पर धकेलने की रणनीति।
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2015-16 बैच के दारोगाओं पर नई व्यवस्था की मार……2015-16 में भर्ती हुए दारोगा इस समय प्रदेश के लगभग हर जिले में पुलिसिंग की मजबूत कड़ी बन चुके हैं। पुलिस चौकी से लेकर थाना प्रभारी तक की जिम्मेदारी इन अधिकारियों ने प्रभावी ढंग से निभाई है। विवेचनाओं को गति देने, अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में इन दारोगाओं का प्रदर्शन लगातार बेहतर माना जा रहा है। लेकिन थानों के कोतवाली में उच्चीकरण और नई संरचना के चलते ऐसे अनुभवी दारोगाओं के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। दारोगाओं के लिए चार्ज मिलने की संभावनाएं घटने से इंस्पेक्टर बनने का रास्ता और लंबा हो जाएगा। यानी जो अधिकारी फिलहाल फील्ड में सबसे मजबूत भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें अगली जिम्मेदारी तक पहुंचने के लिए एक अरसे तक इंतजार करना पड़ सकता है। पुलिस महकमे के भीतर इसे मेहनती और सक्षम दारोगाओं के साथ सीधा अन्याय माना जा रहा है।
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चार प्रमुख जिलों में थानों की स्थिति….देहरादून : क्लेमेंटाउन, रानीपोखरी, सेलाकुई, त्यूणी
उधमसिंहनगर : केलाखेड़ा, पुलभट्टा, झनकईया, दिनेशपुर
नैनीताल : खंस्यू, बेतालघाट, चोरगलिया
हरिद्वार : बुग्गावाला (केवल एक)

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