“तीन दिन भूखे रहे कर्मचारी, अधिकारियों ने अनशन स्थल पर जाने के बजाय बुलवाया दफ्तर..
जोमैटो डिलीवरी कर्मचारियों का अनशन समाप्त, मगर प्रशासनिक संवेदनहीनता पर सवाल..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार: रानीपुर मोड़ पर कंपनी Zomato के डिलीवरी कर्मचारियों का तीन दिन तक चला आमरण अनशन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक संवेदनशीलता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कर्मचारियों ने कंपनी प्रबंधन पर उत्पीड़न और शोषण के आरोप लगाते हुए शांतिपूर्वक अनशन शुरू किया था। उनका कहना था कि बार-बार शिकायत के बावजूद उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। रोज शहरभर में दौड़कर लोगों तक खाना पहुंचाने वाले ये कर्मचारी जब अपने हक के लिए सड़क पर बैठे, तो तीन दिन तक कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी सुध लेने मौके पर नहीं पहुंचा।
धरना स्थल पर बैठे कर्मचारियों की हालत लगातार कमजोर होती रही। वे इस उम्मीद में डटे रहे कि प्रशासन उनके बीच आकर उनकी बात सुनेगा। तीसरे दिन प्रशासन ने पहल तो की, लेकिन अधिकारी अनशन स्थल पर नहीं पहुंचे। सिटी मजिस्ट्रेट कुश्म चौहान ने पुलिस के माध्यम से कर्मचारियों को ही वार्ता के लिए दफ्तर तलब किया। सिटी मजिस्ट्रेट कुश्म चौहान ने कार्यालय में बातचीत की, जिसके बाद अनशन समाप्त हुआ।
मामला केवल अनशन खत्म होने का नहीं, बल्कि उस तरीके का है जिसने चर्चा को जन्म दिया। आमतौर पर जब कोई नागरिक अपने संवैधानिक अधिकार के तहत शांतिपूर्वक धरना या अनशन करता है, तो प्रशासनिक अधिकारी स्थल पर पहुंचकर संवाद करते हैं। इससे भरोसे और सम्मान का संदेश जाता है।
संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। ऐसे में तीन दिन से भूखे-प्यासे बैठे कर्मचारियों को ही दफ्तर बुलाना असंवेदनशील रवैया प्रतीत हो रहा है। अनशन करने वाले जोमैटो कर्मचारियों की जगह कोई नेता, जनप्रतिनिधि है या कोई नामचीन व्यक्ति होता तो क्या उसे भी ऐसे ही दफ्तर में बुलाकर अनशन समाप्त कराया जाता..?
या मौके पर पहुंचकर उसकी समस्या की जानकारी ली जाती। अधिकारी जनता की सेवा के लिए नियुक्त होते हैं और उनका वेतन भी जनता के कर से आता है। ऐसे में अपेक्षा यही रहती है कि जब नागरिक सड़क पर बैठकर अपनी पीड़ा जाहिर करें, तो व्यवस्था खुद उनके बीच पहुंचे।
हरिद्वार की यह घटना इस बात पर सोचने को मजबूर करती है कि लोकतंत्र में केवल समाधान ही नहीं, बल्कि संवाद का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि क्या व्यवस्था और आम आदमी के बीच बढ़ती दूरी को पाटने के लिए संवेदनशील पहल जरूरी नहीं है?
ये है कर्मचारियों की समस्या…..
जोमैटो डिलीवरी कर्मचारियों ने कंपनी की नई नीतियों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि “सुपर मेडल” नियम के तहत 10 किलोमीटर की डिलीवरी के लिए मात्र 23 मिनट दिए जाते हैं और ट्रैफिक या रेलवे फाटक बंद होने जैसी स्थिति में थोड़ी देरी पर भी 10 पॉइंट काट लिए जाते हैं।
पॉइंट घटने से रेटिंग गिरती है और ड्यूटी के घंटे कम मिलते हैं, जिससे आय प्रभावित होती है। कैश ऑन डिलीवरी ऑर्डर ग्राहक रद्द करे तो भी रकम कर्मचारियों से वसूली जाती है। भुगतान अब भी 7–8 रुपये प्रति किमी के पुराने रेट पर है। दुर्घटना बीमा प्रक्रिया जटिल बताई गई है। विरोध करने पर आईडी टर्मिनेट और ब्लैकलिस्ट की धमकी देने का आरोप भी लगाया गया है।



