“तीन अस्थायी पुलों पर नौ करोड़, फिर तीन बार जारी हुए शासनादेश! अर्धकुंभ में बजट की रेलमपेल, कौन कर रहा खेल..
पहले पुलों की मरम्मत और लगाने-उखाड़ने के लिए 7.31 करोड़, फिर रैंप निर्माण पर 1.39 करोड़ और पियर्स की मरम्मत पर 33 लाख की मंजूरी, मेला अधिष्ठान की कार्यप्रणाली और शासन की निगरानी पर सवाल..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार। अर्धकुंभ की तैयारियों के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं की प्लानिंग और बजट निर्धारण की कार्यशैली ही सवालों के घेरे में आ रही है। हरकी पैड़ी पर सिर्फ चार महीने के लिए बनने वाले तीन अस्थायी पुलों का मामला इसका उदाहरण है।
इन पुलों के लिए एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग शासनादेश जारी किए गए। पहले पुलों की मरम्मत और उन्हें लगाने-उखाड़ने के लिए करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत हुआ, फिर अप्रोच रैंप निर्माण के लिए अलग से धनराशि मंजूर की गई और इसके बाद पियर्स की मरम्मत के लिए तीसरा शासनादेश जारी कर दिया गया। तीनों शासनादेशों को मिलाकर कुल स्वीकृत धनराशि नौ करोड़ चार लाख 37 हजार रुपये पहुंच गई है।
हैरानी इस बात की है कि जब तीनों पुलों की पूरी व्यवस्था करनी थी तो शुरुआत में ही सभी जरूरी कार्यों का आकलन क्यों नहीं किया गया? क्या अधिकारियों को पहले यह अंदाजा नहीं था कि इन पुलों से श्रद्धालुओं का आवागमन भी होगा और इसके लिए रैंप की जरूरत पड़ेगी? पियर्स की मरम्मत भी पुलों की संरचना से जुड़ा जरूरी काम है, तो इसे पहले एस्टीमेट में शामिल क्यों नहीं किया गया? इस पूरे मामले ने मेला अधिष्ठान की कार्यशैली पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तीन शासनादेशों में ऐसे बढ़ता गया बजट…….
उपलब्ध शासनादेशों के अनुसार, तीन अस्थायी पुलों से संबंधित कार्यों के लिए पहला शासनादेश 14 अक्टूबर 2025 को जारी किया गया। इसके तहत पुलों की मरम्मत और उन्हें लगाने-उखाड़ने के लिए सात करोड़ 31 लाख 71 हजार रुपये स्वीकृत किए गए। इसके बाद 27 मार्च 2026 को दूसरे शासनादेश के माध्यम से अप्रोच रैंप निर्माण के लिए एक करोड़ 39 लाख 60 हजार रुपये की मंजूरी दी गई। इसके बाद पियर्स की मरम्मत के लिए 33 लाख छह हजार रुपये का तीसरा शासनादेश जारी किया गया।
इस तरह तीनों शासनादेशों के तहत कुल नौ करोड़ चार लाख 37 हजार रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई। सवाल यह है कि क्या ये सभी कार्य मूल परियोजना का हिस्सा नहीं थे? यदि थे तो शुरुआत में इनका समावेश क्यों नहीं किया गया? और यदि बाद में इनकी आवश्यकता सामने आई तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए?
एस्टीमेट बनाने में चूक या योजना बनाने का तरीका ही सवालों में..?
तकनीकी रूप से किसी भी पुल की योजना तैयार करते समय उसकी संरचना, मरम्मत, स्थापना, अप्रोच रैंप और सुरक्षित आवागमन से जुड़े जरूरी पहलुओं का आकलन किया जाता है। खासकर तब, जब करोड़ों रुपये खर्च कर अर्धकुंभ जैसे बड़े आयोजन के लिए अस्थायी पुल तैयार किए जा रहे हों।
ऐसे में तीन अलग-अलग शासनादेश जारी होने की वजह जानना जरूरी है। क्या पहले एस्टीमेट में जरूरी कार्यों को छोड़ दिया गया था? क्या तकनीकी आकलन अधूरा था? या फिर परियोजना को शुरुआत में समग्र रूप से तैयार करने के बजाय अलग-अलग चरणों में बजट स्वीकृत कराने का रास्ता अपनाया गया?
यदि यह तकनीकी चूक है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं, यदि सभी कार्यों की जानकारी पहले से थी तो उन्हें अलग-अलग प्रस्तावों में शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी, इसकी भी जांच होनी चाहिए। यह केवल बजट का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन के नियोजन और उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता का सवाल है।
मेला अधिष्ठान में आखिर हो क्या रहा है….?
अर्धकुंभ की तैयारियों के लिए मेला अधिष्ठान बनाया गया है। यहां अधिकारियों और कर्मचारियों की पूरी व्यवस्था है। शासन स्तर पर भी योजनाओं की स्वीकृति और निगरानी की जिम्मेदारी तय है। इसके बावजूद एक ही परियोजना से जुड़े कार्यों के लिए बार-बार अलग शासनादेश जारी होने की स्थिति सामने आना निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आखिर मेला अधिष्ठान में बैठे अधिकारी कर क्या रहे हैं? करोड़ों रुपये की परियोजनाओं के एस्टीमेट की तकनीकी जांच कौन कर रहा है? शासन के अधिकारी बजट स्वीकृत करने से पहले प्रस्तावों का परीक्षण किस आधार पर कर रहे हैं? क्या यह देखा जा रहा है कि नए प्रस्ताव में शामिल कार्य पहले से स्वीकृत परियोजना का हिस्सा तो नहीं हैं? यदि शुरुआत में ही पूरी योजना का आकलन कर लिया जाता तो क्या अलग-अलग शासनादेशों की नौबत नहीं टाली जा सकती थी?
अर्धकुंभ के बाद उखड़ जाएंगे पुल, जवाबदेही कौन तय करेगा..?
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये अस्थायी पुल अर्धकुंभ के बाद उखाड़ दिए जाएंगे। आयोजन समाप्त होने के साथ इनका उपयोग भी खत्म हो जाएगा, लेकिन इन पर खर्च होने वाली नौ करोड़ चार लाख 37 हजार रुपये की धनराशि का सवाल बना रहेगा। जनता जानना चाहती है कि तीन अस्थायी पुलों के लिए शुरुआत में ही समग्र एस्टीमेट क्यों नहीं बनाया गया? तीन अलग-अलग शासनादेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इससे परियोजना की लागत बढ़ी और क्या सभी स्वीकृत कार्यों का तकनीकी एवं वित्तीय औचित्य स्पष्ट है?
अर्धकुंभ के नाम पर निर्माण कार्यों की लंबी सूची तैयार हो रही है, लेकिन केवल बजट स्वीकृत कर देना ही अच्छी तैयारी का प्रमाण नहीं हो सकता। योजनाओं की जरूरत, लागत, गुणवत्ता और पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। अब शासन को इस पूरे प्रकरण की तकनीकी और वित्तीय जांच करानी चाहिए, ताकि स्पष्ट हो सके कि तीनों शासनादेशों की जरूरत क्यों पड़ी और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। आखिर अर्धकुंभ की तैयारियों में करोड़ों रुपये खर्च करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तो तय होनी चाहिए।



