“शौचालय की जगह स्थापित होगी आदि शंकराचार्य की मूर्ति, अर्धकुंभ से पहले धार्मिक परंपराओं पर उठे सवाल..
पिछले कुंभ में करोड़ों से बने चौक-चौराहे तोड़कर फिर बहाए जा रहे करोड़ों, सीएम साहब..!! ये कैसी प्लानिंग..? जिम्मेदारी किसकी..?

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार; विकास के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च करने के बाद यदि कुछ ही वर्षों में उन्हीं निर्माणों को तोड़ने या दूसरी जगह स्थानांतरित करने की नौबत आ जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। हरिद्वार में वर्ष 2021 के कुंभ मेले के दौरान कराए गए निर्माण अब इसी कसौटी पर खड़े नजर आ रहे हैं।
शहर में बनाए गए कुछ चौक-चौराहों की उपयोगिता पर पुनर्विचार हो रहा है, शंकराचार्य चौक पर करोड़ों रुपये की लागत से बना शौचालय तोड़ा जा चुका है और हरकी पैड़ी के निकट बने पैदल पुल को दूसरी जगह शिफ्ट करने की चर्चा है।
ऐसे में सवाल है कि पांच साल पहले जिन योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, क्या उन्हें बनाते समय भविष्य की जरूरतों का आकलन नहीं किया गया था? यदि योजनाएं दूरदर्शिता के साथ बनाई गई थीं तो इतनी जल्दी बदलाव की जरूरत क्यों पड़ रही है और यदि नियोजन में चूक हुई तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
शौचालय की जगह आदि शंकराचार्य की मूर्ति, धार्मिक मर्यादा का भी ध्यान जरूरी…..
शंकराचार्य चौक पर यातायात संचालन को सुगम बनाने के लिए आदि शंकराचार्य की मूर्ति को दूसरे स्थान पर स्थापित करने का फैसला प्रशासनिक दृष्टि से उचित हो सकता है, लेकिन मूर्ति स्थापना के लिए चुने गए स्थान को लेकर धार्मिक दृष्टिकोण से भी चर्चा हो रही है। जिस जगह पहले शौचालय था, वहां जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित किए जाने को लेकर सवाल है कि क्या भूमि का शुद्धिकरण धार्मिक परंपराओं के अनुरूप कराया गया है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसे स्थल पर देव-मूर्ति या संत-महापुरुष की प्रतिमा स्थापित करने से पहले भूमि-शुद्धि और धार्मिक अनुष्ठान कराए जाने की बात कही जाती है। इनमें गंगाजल से शुद्धिकरण और यज्ञ-हवन जैसे विधान शामिल बताए जाते हैं।
हालांकि, इस स्थल पर ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई है या नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। सनातन धर्म की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आदि शंकराचार्य की मूर्ति के लिए किसी अन्य उपयुक्त स्थल पर विचार किया जा सकता था या नहीं, यह भी चर्चा का विषय है।
पांच साल पहले की प्लानिंग पर जवाबदेही तय होगी….?
विकास योजनाओं में बदलाव होना असामान्य नहीं है। यातायात दबाव और जनसुविधाओं की जरूरतों के अनुसार निर्माणों में संशोधन किया जा सकता है।
लेकिन जब पांच साल के भीतर ही चौक-चौराहों और अन्य सार्वजनिक ढांचों को हटाने या स्थानांतरित करने की जरूरत पड़ने लगे तो उनकी लागत, उपयोगिता और योजना बनाने की प्रक्रिया की समीक्षा भी जरूरी हो जाती है। जनता के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि बदलाव अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण किए जा रहे हैं या पहले की योजना में दूरदर्शिता की कमी थी।
2033 के पूर्ण कुंभ से पहले सबक लेना जरूरी…..
हरिद्वार में वर्ष 2033 में पूर्ण कुंभ का आयोजन प्रस्तावित है। ऐसे में पिछली योजनाओं के अनुभवों से सबक लेना जरूरी है। इस बार निर्माण केवल मेले की तत्काल जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि अगले कई दशकों की आवश्यकताओं के अनुरूप किए जाने चाहिए। यातायात, श्रद्धालुओं की सुविधा, धार्मिक आस्था और सार्वजनिक धन के सदुपयोग के बीच संतुलन बनाना होगा।
आखिर विकास का उद्देश्य नए निर्माण करना भर नहीं, बल्कि ऐसे स्थायी समाधान तैयार करना है जो वर्षों तक उपयोगी बने रहें। जनता की गाढ़ी कमाई से बने निर्माण कुछ ही समय बाद तोड़ने पड़ें तो नियोजन के साथ-साथ जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।



