“चांद दिखने पर अदा होगी साबिर पाक के उर्स की पहली रस्म ‘मेंहदी डोरी’ शाह खालिक मियां साबरी ने बताया कदीमी परंपरा का पूरा प्रोटोकॉल..

पंच👊नामा
पिरान कलियर; हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रह. के सालाना उर्स/मेले का आगाज चांद नजर आते ही उर्स की प्रथम और प्राचीन रस्म ‘मेंहदी डोरी’ के साथ होगा। रबीउल अव्वल का चांद दिखाई देने के बाद ईशा की नमाज के बाद सज्जादानशीन की ओर से इस ऐतिहासिक रस्म को अदा किया जाएगा। इस रस्म को लेकर कलियर में अकीदतमंदों के बीच खासा उत्साह है और बड़ी संख्या में जायरीन इसमें शिरकत करेंगे।
मेंहदी डोरी की यह प्राचीन रस्म सज्जादानशीन परिवार के कदीमी घर से शुरू होती है, जिसे वर्तमान में शाह नन्हे मियां साबरी कुद्दुसी मरहूम के मकान के नाम से जाना जाता है। सज्जादानशीन परिवार के सदस्य शाह नन्हे मियां के साहिबजादे शाह खालिक मियां साबरी ने बताया कि मेंहदी डोरी की परंपरा शाह अब्दुल रहीम साबरी कुद्दुसी के दौर से चली आ रही है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी अकीदत, विश्वास और सम्मान के साथ निभाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि रस्म से पहले फातिहा ख्वानी की जाती है। इसके बाद सज्जादानशीन जायरीनों, सूफी संतों और बस्ती के लोगों के साथ कदीमी घर के लिए रवाना होते हैं। वहां फातिहा ख्वानी और हल्का होने के दौरान मेंहदी डोरी संदल को थाल में रखकर सिरों पर उठाया जाता है और अदब व अकीदत के साथ दरगाह शरीफ में जुलूस के रूप में लाकर में पेश किया जाता है। दरगाह में पेश किए जाने के बाद मेंहदी डोरी को तबर्रुक के तौर पर जायरीनों में तकसीम किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहते हैं और पूरी रस्म अकीदत व रूहानी माहौल के बीच संपन्न होती है।
शाह खालिक मियां साबरी ने बताया कि मेंहदी डोरी की रस्म से जुड़े तमाम इंतजाम उनकी ओर से किए जाते हैं। उर्स की पहली रस्म होने के चलते इसे लेकर कलियर में तैयारियां भी तेज हो गई हैं और जायरीनों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो चुका है। मेंहदी डोरी की रस्म के साथ ही साबिर पाक के सालाना उर्स की धार्मिक और रूहानी रस्मों का सिलसिला आगे बढ़ता है। इस ऐतिहासिक परंपरा में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले अकीदतमंद शामिल होकर साबिर पाक की दरगाह पर अमन, खुशहाली और बरकत की दुआएं मांगते हैं।



