पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार: धर्मनगरी में शराब के मिनी ठेके के रूप में शराबियों को ज़रूरी सेवा उपलब्ध कराने वाले शंकर जी की महिमा अनंत है। अब ये शंकर जी की ही तो माया है कि एक बार जिले के हाकिम यानि जिलाधिकारी ने मिनी ठेके की चर्चाएं सुनकर खुद छापा मारने का निर्णय लिया। ये आज़ाद भारत में शायद पहली ऐसी घटना रही होगी जब जिलाधिकारी ने स्वयं दफ्तर से निकलकर अवैध शराब पकड़ने के लिये छापा मारा।
लेकिन नतीजा क्या निकला। वर्दी से लेकर बेवर्दी तक, शंकर जी के इतने आंख, नाक, कान हैं कि मिनटों में पूरा स्टॉक हवा और डीएम साहब के हाथ आया केवल शराब का एक पव्वा। शंकर जी चाहते तो एक पव्वा भी न छोड़ते। मगर नहीं, शंकर जी सेवा में लीन रहते हैं, इसलिए दिल के भले हैं। डीएम साहब को भी बुरा न लगे कि इतनी मेहनत की, मिला कुछ नहीं।
खैर ये तो शंकर जी की गहरी जड़ों का एक छोटा सा प्रमाण है। उसके बाद तो डीएम छोड़िए, किसी सिटी मजिस्ट्रेट ने झांकने की हिम्मत नहीं की। कुछ दिन पहले आबकारी विभाग की एक टीम ज़रूर गलती या धोखे से शंकर जी की (शराब की) डेयरी पर पहुंच गई थी।
लेकिन पुलिस…!! तौबा कीजिये, पूरे शहर में छापेमारी हो जाये, मगर मजाल है कि कोई सिपाही भी शंकर जी की चौखट लांघ दे। तो ये है शंकर जी की महिमा, जो सबको हर महीने प्रसाद बांटकर सुखी जीवन का आशीर्वाद देती है।
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जायसवाल की जेब में विधायक, अफसर व पार्षद……
शराब माफिया जायसवाल का इतना बड़ा सिंडिकेट हरिद्वार में फैला हुआ है कि कई ठेके भी उसमें समा सकते हैं। जायसवाल एंड कंपनी की प्रतिदिन की खपत कई ठेकों के पूरे महीने की खपत से कहीं ज्यादा है। शंकर की तरह जायसवाल की दयालु किस्म के इंसान हैं, इसलिए नेता, पार्षद, अफसर व अन्य…. सबका ख्याल रखते हैं।
छोटे घर से लेकर बड़े घर तक हर जगह तक उनकी पाइपलाइन बिछी हुई है। जयसवाल की टीम का तो पूछिये ही मत। ये धंधा किसी दो नम्बर के धंधे की तरह नहीं, बल्कि पूरे “सिस्टम” की तरह चलता है। शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में उसके दर्जनों ठिकाने हैं।
कहीं कोई खंडहर उसका गोदाम है, तो कहीं सरकारी शौचालय ही अस्थायी सेंटर बना दिया गया है। झोपड़ियों से लेकर तंग गलियों तक गुर्गे डटे हैं। स्कूटी पर सवार ये इतने फुर्तीले हैं कि बड़ी-बड़ी ऑनलाइन डिलीवरी कंपनियां भी शरमा जाए। ऑर्डर आया नहीं कि मिनटों में “सेवा” हाजिर।
कहते हैं, जायसवाल ने अपने धंधे को भी वार्डों में बांट रखा है। हर इलाके का अलग सेवादार, अलग हिसाब और अलग जिम्मेदारी। कोई दिन संभालता है, कोई रात। कहीं पुरुष मोर्चा तैनात है तो कहीं महिलाओं के भरोसे पूरा ठिकाना चलता है। गलियों में नए चेहरे कम ही दिखते हैं, क्योंकि हर ठिकाने पर पुराने और भरोसेमंद चेले ही ड्यूटी बजाते हैं।
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: अगली किश्त में पढ़ें… सरकारी सिस्टम ही नहीं, सामाजिक और धार्मिक संगठन भी शंकर जी और जयसवाल जी के आगे नतमस्तक…..



