
पंच👊नामा
पिरान कलियर; दरगाह हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रह. के 758वें सालाना उर्स/मेले में एक ओर प्रशासन और पुलिस जायरीनों की सुविधाओं, सुरक्षा और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर इसी भीड़ और आपाधापी के बीच कुछ ऐसे ‘खिलाड़ी’ भी सक्रिय नजर आ रहे हैं, जिन्हें व्यवस्था से ज्यादा अपना उल्लू सीधा करने की चिंता दिखाई देती है। ताजा मामला दरगाह के साबरी गेस्ट हाउस से जुड़ा सामने आ रहा है, जहां बंद पड़े दो कमरों में कथित तौर पर दखल की कोशिश ने दरगाह कार्यालय की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, दरगाह प्रबंधन द्वारा साबरी गेस्ट हाउस को खाली कराकर बंद कराया गया था। बताया जा रहा है कि इसी बीच एक व्यक्ति ने कथित तौर पर दरगाह कार्यालय में दो कमरों के आवंटन की बात कहते हुए बंद कमरों में दखल देने का प्रयास किया। मामला जब अधिकारियों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्होंने पूरे प्रकरण की जांच कराने और आरोप सही पाए जाने पर एफआईआर तक कराने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आ रही है।
सवाल यह है कि जब गेस्ट हाउस को बाकायदा खाली कराकर बंद कराया गया था तो फिर अचानक बंद कमरों तक किसी की पहुंच कैसे हो गई? अगर कमरों का वास्तव में आवंटन हुआ था तो उसका रिकॉर्ड क्या है और यदि आवंटन नहीं हुआ था तो फिर किसके भरोसे पर बंद कमरों में दखल देने की कोशिश की गई?
सबसे बड़ा सवाल दरगाह कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर भी उठ रहा है। आखिर जिन मामलों की भनक अधिकारियों तक पहुंच जाती है, वे मामले कार्यालय में तैनात जिम्मेदार लोगों की निगरानी में क्यों नहीं आते? क्या उर्स/मेले की व्यस्तता के नाम पर निगरानी व्यवस्था ढीली पड़ गई है
या फिर व्यवस्था की इसी व्यस्तता को कुछ लोग ‘मौके’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.? दरगाह की संपत्तियों और परिसरों की सुरक्षा व निगरानी किसी छोटे-मोटे काम का हिस्सा नहीं है। खासकर उर्स के दौरान जब हजारों-लाखों जायरीन कलियर पहुंचते हैं और दरगाह परिसर में गतिविधियां कई गुना बढ़ जाती हैं, ऐसे में बंद परिसरों और कमरों की निगरानी और भी अहम हो जाती है।
ऐसे में साबरी गेस्ट हाउस के दो कमरों को लेकर सामने आया मामला महज कब्जे के प्रयास तक सीमित है या इसके पीछे कोई और कहानी है, यह जांच का विषय है। लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि अगर अधिकारी तक मामला पहुंचने के बाद जांच और एफआईआर की नौबत आ सकती है, तो फिर शुरुआती स्तर पर निगरानी करने वाले जिम्मेदारों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
उर्स की भीड़ में अगर कोई यह समझ रहा है कि प्रशासनिक व्यस्तता के बीच नियम-कायदे भीड़ में कहीं खो जाएंगे, तो ऐसे मामलों पर सख्ती जरूरी है। वरना कल कोई बंद कमरा खोलेगा, परसों किसी और संपत्ति पर दावा ठोकेगा और फिर फाइलों में ‘आवंटन’ तलाशा जाएगा। फिलहाल साबरी गेस्ट हाउस के दो कमरों का मामला जांच के दायरे में है। जांच के बाद ही साफ होगा कि यह महज किसी व्यक्ति की मनमानी थी या फिर पर्दे के पीछे सचमुच किसी ‘सांठगांठ’ का खेल चल रहा था।



