“दरबार से दूरी और मेले की बदहाली पर चुप्पी… आखिर नाराजगी किससे थी विधायक साहब.?
न चादरपोशी, न निरीक्षण और न अधिकारियों से सवाल; जलभराव में तैरती रही पूरी व्यवस्था..?

पंच👊नामा
पिरान कलियर; सालाना उर्स और मेला तो आखिरकार संपन्न हो गया, लेकिन पीछे ऐसे कई सवाल छोड़ गया, जिनका जवाब शायद आने वाले दिनों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों को देना पड़े। कहा जाए कि इस बार साबिर पाक रहमतुल्लाह अलैह का सालाना उर्स और मेला व्यवस्थाओं के नहीं, बल्कि खुद साबिर पाक के भरोसे संपन्न हुआ, तो शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मेले में अव्यवस्थाओं की बारिश होती रही और जिम्मेदारों की मौजूदगी सूखे मौसम की तरह गायब नजर आई। बारिश ने जहां मेले की व्यवस्थाओं को पानी-पानी किया, वहीं स्थानीय विधायक की बेरुखी ने लोगों के बीच कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया। सवाल सिर्फ यह नहीं कि व्यवस्था क्यों बिगड़ी, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जब व्यवस्था बिगड़ रही थी, तब व्यवस्था सुधारने का जिम्मा लेने वाले आखिर कहां थे?
साबिर पाक रह. का सालाना उर्स केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लाखों जायरीनों की आस्था और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा एक बड़ा आयोजन है। हर साल इस मेले में स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और दरगाह से जुड़े जिम्मेदार लोगों की सक्रियता दिखाई देती रही है, लेकिन इस बार हालात कुछ अलग नजर आए।
सबसे ज्यादा सवाल स्थानीय विधायक हाजी फुरकान अहमद की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। आरोप है कि उर्स शुरू होने से लेकर उसके संपन्न होने तक विधायक ने दरगाह शरीफ में हाजिरी लगाना तक जरूरी नहीं समझा। जबकि वर्षों से स्थानीय विधायक दरबार में पहुंचकर चादरपोशी करते रहे हैं। ऐसे में स्थानीय विधायक की इस बार की गैरमौजूदगी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही।
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, जो दरबार-ए-साबरी में अपनी गहरी आस्था जताते रहे हैं, उनकी ओर से भी इस बार चादर पेश न किए जाने की चर्चा रही। दूसरी ओर हरिद्वार के भाजपा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने प्रतिनिधि के माध्यम से दरबार में चादर पेश कराई। ऐसे में स्थानीय विधायक और उनकी पार्टी की ओर से दरबार से दूरी बनाए रखना लोगों की समझ से परे बताया जा रहा है।
पिरान कलियर की बदहाल व्यवस्था पर स्थानीय विधायक अक्सर सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली सवाल उठाते रहे हैं, लेकिन इस बार अपने ही विधानसभा क्षेत्र के सबसे बड़े धार्मिक मेले में सामने आई अव्यवस्थाओं पर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
बारिश के बाद मेले में जलभराव की स्थिति बनी रही। सफाई व्यवस्था को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे। दरगाह की जामा मस्जिद तक बारिश का पानी पहुंचने की बात सामने आई। जायरीनों और दुकानदारों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। स्वास्थ्य सुविधाएं, सफाई, सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं भी कई स्थानों पर पटरी से उतरती दिखाई दीं।
लेकिन सवाल यह है कि इन हालातों के बीच स्थानीय विधायक ने अधिकारियों के साथ बैठक क्यों नहीं की? उन्होंने मेले का निरीक्षण क्यों नहीं किया? आखिर जलभराव और बदहाल व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यों नहीं मांगा गया?
स्थानीय लोगों के मुताबिक, पूर्व में उर्स मेले के दौरान स्थानीय विधायक का बाकायदा कैंप लगाया जाता रहा है। जिलाधिकारी स्तर से भी व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए सक्रिय मौजूदगी रहती थी। लेकिन इस बार न तो विधायक का कैंप दिखाई दिया और न ही जिलाधिकारी के स्तर से मेले के निरीक्षण को लेकर वह सक्रियता नजर आई, जिसकी इस विशाल आयोजन में अपेक्षा की जाती है। यही वजह है कि लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर पिरान कलियर के इतने बड़े धार्मिक आयोजन को इस तरह लावारिस हालात में क्यों छोड़ दिया गया?
स्थानीय चर्चाओं की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा स्थानीय विधायक के सामने जरूर उठ सकता है। लोगों के मन में सवाल है कि जब जलभराव में व्यवस्थाएं तैर रही थीं, सफाई व्यवस्था सवालों के घेरे में थी और जायरीन परेशान हो रहे थे, तब स्थानीय जनप्रतिनिधि ने जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब क्यों नहीं मांगा? सवाल सिर्फ एक उर्स मेले की बदइंतजामी का नहीं है, बल्कि उस जिम्मेदारी का भी है, जिसे जनता अपने जनप्रतिनिधि के कंधों पर रखती है।
उर्स और मेला संपन्न हो गया, जायरीन लौट गए, दुकानें हटना शुरू हो गईं और अस्थायी इंतजाम भी खत्म हो गए, लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़े हैं—बारिश के पानी में डूबी व्यवस्थाओं को आखिर किसने संभाला? जिम्मेदार कौन था? और जब जिम्मेदारों की जरूरत थी, तब वे कहां थे? कहने को मेला संपन्न हो गया, मगर सवाल अभी बाकी हैं… और शायद इन सवालों का जवाब आने वाले चुनाव में जनता जरूर तलाशेगी।



