“गरीब के आशियाने पर हंटर, चर्चित और विवादित अमेरिकन आश्रम की दुकानों पर खामोशी!
आखिर क्यों ठिठक रहे प्रशासन और एचआरडीए के कदम, ताबड़तोड़ ज्ञापनों पर भी नहीं रेंग रही जूं..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार; यूं तो हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (एचआरडीए) के कारिंदों को अवैध निर्माण की भनक कई-कई किलोमीटर दूर से लग जाती है। गली-मोहल्ले में कहीं ईंट, रेत या बजरी दिखाई दी नहीं कि प्राधिकरण की नजरें चौकन्नी हो जाती हैं और कर्मचारी मौके पर पहुंच जाते हैं। लेकिन बहुचर्चित अमेरिकन आश्रम प्रकरण में प्राधिकरण की कार्यशैली बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
अमेरिकन आश्रम के बाहर बनाई गई दुकानों को लेकर ताबड़तोड़ ज्ञापन और शिकायतें अधिकारियों तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक खामोशी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर प्रशासन और एचआरडीए के कदम यहां आकर क्यों ठिठक रहे हैं? इतने ज्ञापनों के बाद भी कार्रवाई की जूं आखिर क्यों नहीं रेंग रही?
पूरे शहर में कहीं भी छोटा-बड़ा निर्माण शुरू हो जाए तो एचआरडीए के कर्मचारियों को उसकी भनक लग जाती है। हालात यह हैं कि कई बार एक गरीब अपने घर की मरम्मत के लिए ईंट और बजरी रखता है तो प्राधिकरण की निगाह वहां तक पहुंच जाती है। कार्रवाई का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। लेकिन अमेरिकन आश्रम के बाहर बनी दुकानों के मामले में ऐसा लगता है मानो विभाग की नजरें अचानक धुंधली पड़ गई हों।
आश्रम की तरफ बढ़ने से पहले ही कदम ठिठक रहे हैं या किसी दबाव ने रास्ता रोक रखा है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि शिकायतें और ज्ञापन लगातार दिए जाने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।
अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चाओं में रहने वाली एचआरडीए की वीसी सोनिका की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है। आखिर शिकायतों के बावजूद मौके पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या विभाग के लिए नियमों का पैमाना निर्माण करने वाले की हैसियत देखकर बदल जाता है?
एचआरडीए की कार्रवाई का अंदाज शहर में किसी से छिपा नहीं है। गरीब के छोटे से आशियाने पर विभागीय अमला पूरी तेजी से पहुंच जाता है, लेकिन अमेरिकन आश्रम का नाम आते ही वही रफ्तार जैसे सरकारी फाइलों के बीच कहीं गुम हो जाती है।
सवाल सिर्फ दुकानों का नहीं, प्रशासन और प्राधिकरण की कथित दोहरी कार्यशैली का भी है। अगर निर्माण नियमों के विपरीत है तो कार्रवाई होनी चाहिए और अगर वैध है तो शिकायतकर्ताओं को स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। मगर चुप्पी किसी भी स्थिति में सवालों को और गहरा ही करती है।
आखिर क्या मजबूरी है कि जिस एचआरडीए को शहर के किसी कोने में रखी ईंट, रेत और बजरी तक दिखाई दे जाती है, उसे अमेरिकन आश्रम के बाहर खड़ी दुकानों का निर्माण नजर नहीं आ रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि यहां पहुंचते-पहुंचते नियमों की आंखों पर भी पट्टी बंध जाती है?



