“कलियर में जायरीन की ‘पूरी खातिरदारी’— पहले जेब कटी, फिर मोबाइल गया, चप्पल भी हुई गायब.!
लंगर की लाइन में जेब कटी, दरगाह में मोबाइल गया, नमाज के बाद चप्पलें भी नदारद; जायरीन बोले—‘एक-दो दिन और रुका तो तन के कपड़ों की भी खैर नहीं.!

पंच👊नामा
पिरान कलियर; आस्था लेकर पिरान कलियर पहुंचे जायरीन को यहां कभी जेबकतरों का सामना करना पड़ रहा है तो कभी चोरों का। ऊपर से बुनियादी सुविधाओं का ऐसा हाल कि जायरीन परेशान होकर व्यवस्था पर सवाल उठाने को मजबूर हैं। लंगर लेने के लिए लाइन में लगे तो जेब कट गई, दरगाह में हाजिरी लगाने पहुंचे तो मोबाइल गायब हो गया और नमाज पढ़कर मस्जिद से लौटे तो चप्पलें भी नदारद मिलीं। इन घटनाओं से परेशान शाहजहांपुर से आए एक जायरीन ने तो व्यवस्था पर तंज कसते हुए कह दिया—“एक-दो दिन और रुक गया तो तन के कपड़े भी गायब न हो जाएं!”
सुनने में यह बात भले ही अटपटी और फिल्मी संवाद जैसी लगे, लेकिन जायरीन के मुताबिक पिरान कलियर में उनके साथ कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से दरगाह में हाजिरी के लिए पहुंचे जायरीन ने अपने साथ बीती घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि वह यहां आस्था और सुकून की उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन एक के बाद एक परेशानियों ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया।
जायरीन के मुताबिक, लंगर लेने के लिए लाइन में खड़े हुए तो जेबकतरों ने जेब काट ली। इसके बाद दरगाह में हाजिरी लगाने पहुंचे तो मौका देखकर चोर मोबाइल फोन पर हाथ साफ कर गए। अभी इन घटनाओं से उबर भी नहीं पाए थे कि नमाज पढ़ने मस्जिद पहुंचे। नमाज अदा करने के बाद वापस लौटे तो बाहर रखी चप्पलें भी गायब मिलीं। यानी जायरीन की नजर में कलियर में जेब, मोबाइल और चप्पल—तीनों की अपनी-अपनी ‘परीक्षा’ हो रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि परीक्षा कौन ले रहा है और जिम्मेदारी किसकी है, इसका जवाब किसी के पास नहीं।
‘सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं’…?
जायरीन के साथ आए उनके साथी ने भी कलियर की व्यवस्थाओं पर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि वह देश की अलग-अलग दरगाहों पर जाते हैं और वहां जायरीनों की सुविधा के लिए मस्जिदों व धार्मिक स्थलों के आसपास शौचालय जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं रहती हैं, लेकिन पिरान कलियर में स्थिति काफी अलग है।
उनका कहना था कि यहां शौचालय जाने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले चार दिनों में करीब दो से ढाई सौ रुपये सिर्फ शौचालय के लिए खर्च हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जो गरीब जायरीन बड़ी मुश्किल से सफर का खर्च जुटाकर दरगाह तक पहुंचता है, वह हर छोटी-बड़ी सुविधा के लिए अलग से पैसा कहां से लाए?
शौचालय भी ‘पेड’, तो गरीब जायरीन करे क्या…?
मामला महज कुछ रुपये खर्च होने का नहीं है, बल्कि सवाल बुनियादी सुविधा और व्यवस्था का है। यदि धार्मिक स्थल पर आने वाले जायरीन को शौचालय जैसी आवश्यक सुविधा के लिए भी बार-बार जेब ढीली करनी पड़े तो गरीब जायरीन के सामने आखिर विकल्प क्या बचता है? जायरीनों का कहना है कि यही वजह है कि कलियर में आज भी कुछ गरीब लोग नहर किनारे खुले में शौच करने को मजबूर नजर आते हैं। इससे आसपास गंदगी फैलती है और धार्मिक स्थल की साफ-सफाई व छवि पर भी सवाल खड़े होते हैं।
करोड़ों की आमदनी, सुविधाओं में फिर भी कमी क्यों…?
पिरान कलियर देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी जायरीनों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला प्रमुख धार्मिक स्थल है। हर साल बड़ी संख्या में जायरीन यहां पहुंचते हैं और दरगाह को करोड़ों रुपये की आमदनी होने की बात सामने आती रही है। ऐसे में जायरीनों का सवाल जायज है कि जब आमदनी करोड़ों में है तो सुविधाएं अब भी सवालों में क्यों हैं?
जायरीन के लिए पर्याप्त शौचालय, स्वच्छता, पेयजल, सुरक्षा और चोरी-जेबकटी पर प्रभावी नियंत्रण जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं किसी भी बड़े धार्मिक स्थल की प्राथमिक जरूरत होनी चाहिए। लेकिन अगर जायरीन यहां आकर अपनी जेब, मोबाइल और चप्पल तक सुरक्षित न रख पाए और शौचालय जाने के लिए भी पैसे देने पड़ें, तो व्यवस्थाओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आस्था लेकर आएं या सामान की रखवाली करें..?
दूर-दराज से आने वाला जायरीन दरगाह में हाजिरी, इबादत और सुकून के लिए पहुंचता है। उसे हर वक्त यह चिंता रहे कि कहीं जेब न कट जाए, मोबाइल न चोरी हो जाए या मस्जिद से लौटते वक्त चप्पल नदारद न मिले, तो यह स्थिति निश्चित तौर पर गंभीर है। पिरान कलियर जैसे विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल की पहचान सिर्फ यहां आने वाली भीड़ या दरगाह में होने वाली आमदनी से नहीं बनती।
पहचान इस बात से भी बनती है कि यहां आने वाले जायरीन को कितनी सुरक्षा, कितनी सुविधा और कितना सम्मान मिलता है। जायरीन के साथ हुई घटनाएं और उनके द्वारा उठाए गए सवाल जिम्मेदारों के लिए आईना हैं। अब जरूरत है कि इस आईने में तस्वीर देखने के साथ-साथ उसे बदलने की भी कोशिश हो। क्योंकि जायरीन यहां से आस्था और सुकून की याद लेकर जाएं, जेब कटने, मोबाइल चोरी होने और चप्पल गायब होने का किस्सा लेकर नहीं—यही किसी भी तीर्थस्थल की असली कामयाबी होगी।



