“सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा पर डीएम ने बुलाई बैठक, सांसद और विधायक से लेकर मेयर तक नदारद..
जनप्रतिनिधियों की गैरहाजिरी पर सवाल, खानापूर्ति के लिए चर्चा में भेजे अपने-अपने प्रतिनिधि, जनता के मुद्दों पर समय भी नहीं तो काहें के जनप्रतिनिधि..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार; सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने जिला चिकित्सालय, महिला चिकित्सालय और मेला चिकित्सालय में चिकित्सा सुविधाएं दुरुस्त करने, उपकरणों और दवाइयों की खरीद समेत अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई,
लेकिन सांसद और विधायक से लेकर मेयर तक कोई जनप्रतिनिधि इसमें शामिल नहीं हुआ। सभी ने खुद आने के बजाय अपने-अपने प्रतिनिधियों को भेजकर खानापूर्ति कर दी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब जनता के स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों के लिए भी जनप्रतिनिधियों के पास समय नहीं है तो फिर जनता के हितों की चिंता कौन करेगा?
बैठक में सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने, जरूरी उपकरणों की खरीद, दवाइयों की उपलब्धता और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा की गई। जिला चिकित्सालय और महिला चिकित्सालय में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं, जबकि मेला चिकित्सालय की व्यवस्थाएं भी हरिद्वार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इन अस्पतालों की व्यवस्थाओं से सीधे तौर पर आमजन जुड़ा है। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े मामलों में सक्रिय भागीदारी निभाएंगे। लेकिन बैठक में किसी भी जनप्रतिनिधि का स्वयं मौजूद न होना कई सवाल छोड़ गया।
सांसद, विधायक और मेयर की ओर से उनके प्रतिनिधि बैठक में जरूर पहुंचे, लेकिन जनता की समस्याओं से जुड़े इस अहम विषय पर स्वयं समय देना जरूरी नहीं समझा गया। सवाल यह भी है कि यदि प्रशासन स्तर पर अस्पतालों की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीरता से मंथन हो रहा है तो जनप्रतिनिधियों की इसमें सीधी भागीदारी क्यों नहीं दिखी।
जनता अपने प्रतिनिधियों को केवल चुनाव के समय वोट देने के लिए नहीं चुनती, बल्कि क्षेत्र की समस्याओं को उठाने और उनके समाधान के लिए चुनती है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं जैसे सीधे जनहित से जुड़े मुद्दे पर प्रतिनिधि भेजकर जिम्मेदारी पूरी कर लेना जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।



