“सिदिरी के बाहर टीनशेड के लिए खड़ा किया गया स्ट्रक्चर, क्या शुरू हो गया सार्वजनिक जगह पर कब्ज़े का सिलसिला..?
दरगाह दफ्तर में अफसरों और कर्मचारियों की लंबी फौज, इंतज़ामिया की ख़ामोशी पर उठ रहे सवाल, आखिर किसकी 'नज़र-ए-करम..?

पंच👊नामा
पिरान कलियर; विश्व प्रसिद्ध दरगाह हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक (रह.) के सालाना उर्स की आमद में अब चंद रोज़ ही बाकी हैं। दरगाह में रंग-रोगन, साफ-सफाई और इंतज़ामात को अंतिम रूप देने का सिलसिला जारी है, ताकि लाखों अकीदतमंदों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
मगर इन्हीं तैयारियों की आड़ में कुछ ऐसे मंज़र भी सामने आने लगे हैं, जो इंतज़ामिया की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं। दरगाह शरीफ के पैताने में बनी सिदिरियों के बाहर खुले आंगन में लोहे का स्ट्रक्चर खड़ा कर टीनशेड डालने की तैयारी शुरू हो चुकी है। अब सवाल यह है कि यह उर्स की तैयारी है या फिर धीरे-धीरे सार्वजनिक जगह को निजी कब्जे में तब्दील करने की नई इबारत लिखी जा रही है?
दरअसल, जिस स्थान पर यह स्ट्रक्चर खड़ा किया गया है, वह कोई निजी जमीन नहीं बल्कि वह खुला आंगन है, जहां से रोजाना जायरीन आवाजाही करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसों से यह हिस्सा आम रास्ते के तौर पर इस्तेमाल होता आया है, लेकिन अब यहां टीनशेड डालकर स्थायी कब्जे की बुनियाद रखी जा रही है। हैरत की बात यह है कि लोहे का पूरा ढांचा खड़ा हो गया, मगर किसी जिम्मेदार की नजर उस पर नहीं पड़ी। या फिर यूं कहें कि नजर तो पड़ी, लेकिन जानबूझकर फेर ली गई।
दरगाह में अगर कोई अकीदतमंद अपनी अकीदत के तहत मामूली सा काम भी कराना चाहे तो उसे बाकायदा दरगाह कार्यालय से इजाजत लेनी पड़ती है। बिना अनुमति एक ईंट तक रखने की छूट नहीं मिलती। ऐसे में सवाल लाज़िमी है कि आखिर सिदिरी के बाहर इतना बड़ा स्ट्रक्चर खड़ा करने की इजाजत किसने दी? अगर इजाजत दी गई है तो किन उसूलों और किन बुनियादों पर दी गई? और अगर इजाजत नहीं दी गई, तो फिर यह काम किसके इशारे पर बेखौफ होकर किया जा रहा है?
सबसे बड़ा सवाल भविष्य को लेकर भी खड़ा हो रहा है। अगर आज एक सिदिरी के बाहर टीनशेड लग गया तो कल दूसरी और परसों तीसरी सिदिरी भी यही रास्ता अख्तियार करेगी। फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब पूरा खुला आंगन टीनशेडों से पट जाएगा और जायरीनों के लिए निकलने का रास्ता भी तंग पड़ जाएगा। आखिर उस वक्त जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या तब भी यही कहा जाएगा कि मामला जानकारी में नहीं था?
दिलचस्प बात यह भी है कि दरगाह कार्यालय में एक प्रबंधक, आधा दर्जन के करीब सुपरवाइजर और दर्जनों कर्मचारी तैनात हैं। निगरानी के लिए पूरा अमला मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद अगर सार्वजनिक स्थान पर इस तरह का निर्माण बेधड़क जारी है तो सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर यह खामोशी किसकी मेहरबानी का नतीजा है? क्या जिम्मेदार वाकई बेखबर हैं या फिर सब कुछ उनकी सरपरस्ती में हो रहा है.?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सिदिरियों पर गद्दी लगाने वाले लोग अपनी पीरी-मुरीदी का सिलसिला चलाते हैं और उनके मुरीद बड़ी तादाद में वहां पहुंचते हैं। ऐसे में अगर सिदिरी के बाहर भी टीनशेड डालकर उस हिस्से पर व्यवहारिक तौर पर कब्जा कायम हो गया तो आने वाले वक्त में यह सार्वजनिक आंगन भी निजी दायरे में सिमट जाएगा। सवाल सिर्फ एक टीनशेड का नहीं, बल्कि उस नज़ीर का है, जो कल दूसरे लोगों के लिए भी रास्ता खोल सकती है।
अब निगाहें दरगाह इंतज़ामिया पर टिकी हैं। क्या उर्स से पहले इस निर्माण की वैधता की जांच होगी? क्या यह साफ किया जाएगा कि इसकी अनुमति किसने दी? या फिर हर बार की तरह सवाल उठेंगे, चर्चाएं होंगी और फिर मामला फाइलों की गर्द में दफ्न हो जाएगा। फिलहाल इतना जरूर है कि उर्स की तैयारियों के बीच खड़ा यह लोहे का ढांचा, व्यवस्थाओं से ज्यादा सवालों का ढांचा बन चुका है, जिसका जवाब दरगाह प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों को देर-सबेर देना ही होगा।



