“गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में नियुक्तियों पर उठे सवाल, नियमों की अनदेखी और भाई-भतीजावाद के आरोप..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार; गुरुकुल कांगड़ी (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) में हाल ही में हुई नियुक्तियों को लेकर विवाद गहराने लगा है। विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों और संबंधित पक्षों ने नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी, पारदर्शिता की कमी और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोपों के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि वर्तमान में कार्यवाहक (इंटरिम) कुलपति के रूप में कार्यरत प्रो. प्रतिभा मेहता लूथरा के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उनका कहना है कि कार्यवाहक कुलपति को नियमित या संविदा पदों पर नियुक्ति के लिए साक्षात्कार आयोजित कराने अथवा अंतिम निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय में संविदा पदों के लिए साक्षात्कार आयोजित किए गए और नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। आरोप लगाने वालों का कहना है कि इससे पूरी प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
आरोप यह भी लगाए गए हैं कि विश्वविद्यालय के एक तकनीकी विभाग में कार्यरत कई अनुभवी शिक्षकों को हटाकर एक नए उम्मीदवार की नियुक्ति का रास्ता तैयार किया गया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि नियुक्त किया गया उम्मीदवार विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति का पुत्र है। इसी कारण नियुक्ति प्रक्रिया पर भाई-भतीजावाद के आरोप लग रहे हैं। उनका कहना है कि यदि चयन पूरी तरह योग्यता और निर्धारित मानकों के आधार पर हुआ है तो विश्वविद्यालय प्रशासन को पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक कर सभी शंकाओं का समाधान करना चाहिए।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार विश्वविद्यालय में स्थापित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उनका आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता के बजाय व्यक्तिगत संबंधों को प्राथमिकता दी गई, जिससे योग्य अभ्यर्थियों के साथ न्याय नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच नहीं कराई गई तो इससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक साख, प्रशासनिक विश्वसनीयता और विद्यार्थियों का संस्थान पर विश्वास प्रभावित हो सकता है।
मामले को लेकर विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोगों का मानना है कि किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की प्रतिष्ठा उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि नियुक्तियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी। प्रशासन का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। यदि मामले में कोई जांच होती है या प्रशासन की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया जाता है, तो उसके आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।



