“बिना नीलामी, बिना आदेश आखिर किसके इशारे पर दुकान नम्बर-3 पर कराया गया कब्जा..!
दो दिन बाद भी नही कराई गई दुकान खाली, आखिर किसने बांधे हाथ, सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को लग रहा पलीता.!
पंच👊नामा
पिरान कलियर: “दूध की रखवाली बिल्ली के सुपुर्द” वाली कहावत इन दिनों पिरान कलियर दरगाह दफ्तर पर बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही है। वजह भी साफ है—जब दरगाह की आय और संपत्तियों की जिम्मेदारी संभालने वाले ही नियम-कायदे को ताक पर रखकर मनमानी करने लगें, तो फिर पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद आखिर किससे की जाए..?
ताजा मामला हज हाउस मार्ग स्थित नीलामी वाली चार दुकानों से जुड़ा है, जहां दुकान नम्बर-3 को लेकर ऐसा खेल सामने आया है जिसने दरगाह दफ्तर की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि मंगलवार को दिन के उजाले में ही पुराने किरायेदार को हटाकर एक नए व्यक्ति को दुकान पर कब्जा दिला दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि पूरा घटनाक्रम कथित तौर पर “प्रबंधक/तहसीलदार के आदेश” का हवाला देकर अंजाम दिया गया।
बताया जा रहा है कि दरगाह दफ्तर में तैनात अकाउंटेंट सद्दाम हुसैन ने पुराने दुकानदार को फोन कर साफ शब्दों में दुकान खाली करने को कहा। दुकानदार ने कुछ समय की मोहलत मांगी, लेकिन उसे कोई राहत नहीं दी गई। इसके बाद दोपहर में पीआरडी कर्मियों के साथ मौके पर पहुंचकर दुकान में दूसरे व्यक्ति के बर्तन, भगोने, लकड़ी के तख्त और अन्य सामान रखवाकर कब्जा दिला दिया गया।
मामले में ट्विस्ट तब आया जब अगले ही दिन प्रबंधक/तहसीलदार विकास अवस्थी से इस संबंध में जानकारी ली गई। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उन्होंने किसी एक दुकान को खाली कराकर दूसरे व्यक्ति को कब्जा दिलाने का कोई आदेश नहीं दिया।
तहसीलदार के मुताबिक सिर्फ इतना कहा गया था कि जिन दुकानों का किराया जमा नहीं हो रहा है, उन्हें नियमानुसार खाली कराया जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी दूसरे व्यक्ति को कब्जा दिलाने जैसी कोई अनुमति नहीं दी गई और यदि ऐसा हुआ है तो कब्जा हटवाकर दुकान नियमानुसार नीलामी प्रक्रिया से आवंटित की जाएगी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। तहसीलदार के बयान के बावजूद गुरुवार को कथित कब्जाधारी पूरे दिन दुकान नम्बर-3 पर मौजूद रहा और वहां नियाज-लंगर बनाने का काम भी खुलेआम चलता रहा। हैरानी की बात यह रही कि ना तो कब्जा हटाया गया और ना ही वे अधिकारी या कर्मचारी नजर आए जिन्होंने दो दिन पहले इतनी तत्परता दिखाते हुए दुकान खाली कराई थी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दुकान किसी नीलामी प्रक्रिया, टेंडर या डेली बेसिस प्रार्थना पत्र के तहत आवंटित ही नहीं हुई, तो फिर वह व्यक्ति किस अधिकार से दुकान पर बैठा है..? आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा खेल खेला गया..?
चर्चाओं का बाजार गर्म है कि बिना किराया जमा कराए और बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को दुकान का कब्जा दिलाना कोई मामूली बात नहीं। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह सब किसी “विशेष कृपा”, दबाव या फिर निजी स्वार्थ के चलते हुआ..? और यदि तहसीलदार को इसकी जानकारी नहीं थी, तो फिर अकाउंटेंट ने किसके इशारे पर इतना बड़ा जोखिम उठाया..?
दरगाह से जुड़े लोगों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि दरगाह संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही का आईना है। यदि नियमों को दरकिनार कर मनमाने तरीके से कब्जे दिलाए जाएंगे, तो फिर नीलामी प्रक्रिया और सरकारी नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की “जीरो टॉलरेंस” नीति के दौर में इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं..? क्या संदिग्ध भूमिका निभाने वालों पर कार्रवाई होगी..? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा..?



