“गुरुकुल कांगड़ी की प्रायोजक संस्था को लेकर फिर छिड़ी कानूनी जंग, पंजाब सभा ने सिविल कोर्ट की ली शरण..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी (सम) विश्वविद्यालय की प्रायोजक संस्था को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर न्यायालय की चौखट पर पहुंच गया है। पंजाब सभा ने हरिद्वार सिविल कोर्ट में दीवानी वाद दायर कर दिल्ली सभा और हरियाणा सभा के विश्वविद्यालय की प्रायोजक संस्था होने के दावे को चुनौती दी है। मामले की सुनवाई शुरू होने के साथ ही विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे और प्रबंधन से जुड़े अधिकारों पर नई बहस छिड़ गई है।
पंजाब सभा की ओर से दायर वाद में कहा गया है कि दिल्ली सभा और हरियाणा सभा, पंजाब सभा का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में दोनों संस्थाओं का गुरुकुल कांगड़ी (सम) विश्वविद्यालय की प्रायोजक संस्था के रूप में कोई वैधानिक अधिकार अथवा संबंध नहीं बनता। न्यायालय से मांग की गई है कि इन संस्थाओं को विश्वविद्यालय की प्रायोजक संस्था के रूप में प्रस्तुत या प्रचारित किए जाने पर रोक लगाने संबंधी आवश्यक आदेश पारित किए जाएं।
यह वाद पंजाब सभा के अध्यक्ष के रूप में एडवोकेट अश्विनी शर्मा ने दायर किया है। याचिका में दावा किया गया है कि सार्वदेशिक सभा ने अश्विनी शर्मा को ही पंजाब सभा का विधिवत अध्यक्ष स्वीकार किया है। इसी आधार पर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सुदर्शन शर्मा को पंजाब सभा के अध्यक्ष के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के प्रशासन, नीतिगत निर्णयों और प्रबंधन से जुड़े मामलों में प्रायोजक संस्था को लेकर समय-समय पर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। इससे प्रशासनिक निर्णय प्रभावित होने की आशंका रहती है। पंजाब सभा का कहना है कि इस विवाद का न्यायिक समाधान आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी या प्रशासनिक अस्पष्टता न रहे।
वाद में यह भी उल्लेख किया गया है कि पंजाब सभा अपने दावों के समर्थन में विभिन्न दस्तावेज और अभिलेख न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। अब अदालत दोनों पक्षों के तर्क, उपलब्ध साक्ष्य और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर मामले की सुनवाई करेगी। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल है। आर्य समाज के सिद्धांतों पर स्थापित इस विश्वविद्यालय के संचालन और प्रायोजक संस्था को लेकर पूर्व में भी समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे में इस नए वाद को विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि न्यायालय का फैसला केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारों, प्रायोजक संस्था की भूमिका और भविष्य के निर्णयों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में किसी भी पक्ष के दावों पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा। विश्वविद्यालय से जुड़े शिक्षकों, कर्मचारियों, छात्रों, पूर्व छात्रों और आर्य समाज के विभिन्न संगठनों की निगाहें अब हरिद्वार सिविल कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।



