“कामयाबी की खबर पर उमड़ा था पूरा शहर, अब आंसुओं और तानों के सहारे जी रहा परिवार..
'कहां हैं डीएम साहिबा...?'— बच्चों तक के तानों से छलक पड़े मां-बाप के आंसू, बुरे वक्त में अपनों ने भी छोड़ दिया साथ...
पंच👊नामा
प्रवेज़ आलम, रुड़की; कामयाबी की चौखट पर दुनिया रिश्तेदारी तलाशने लगती है, लेकिन जब किस्मत एक करवट बदलती है तो वही दुनिया आंखें फेर लेती है। चढ़ते सूरज को सलाम करने वाले समाज का यह बेरहम चेहरा इन दिनों पिरान कलियर के एक छोटे से घर में साफ दिखाई देता है। कभी जिस घर के बाहर बधाई देने वालों की कतार लगी थी,
आज वहां सन्नाटा है। जिन हाथों ने फूल-मालाएं पहनाई थीं, उन्हीं गलियों से अब ताने सुनाई देते हैं। कल तक जो लोग “हमारी बेटी आईएएस बन गई” कहकर सीना चौड़ा कर रहे थे, आज वही लोग पूछते हैं—”कहां हैं डीएम साहिबा…?” कोई हंसकर कहता है—”हमारी मालाओं के पैसे तो लौटा दो…” और यह सब सुनते-सुनते एक बूढ़ा बाप हार्ट अटैक का मरीज बन गया, जबकि एक मां की आंखों के आंसू अब जैसे सूख चुके हैं।
करीब पांच महीने पहले संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा-2025 के परिणाम आने के बाद पिरान कलियर की फैरुज फातिमा को 708वीं रैंक मिलने की खबर पूरे क्षेत्र में जंगल की आग की तरह फैल गई थी। देखते ही देखते पूरे इलाके में जश्न का माहौल बन गया। उत्तराखंड के नारसन बॉर्डर से उनका भव्य स्वागत किया गया।
फूल-मालाओं से लाद दिया गया। ढोल बजे, मिठाइयां बंटी, बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। नेताओं, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और दूर-दराज के रिश्तेदारों ने भी घर पहुंचकर खुद को इस सफलता का हिस्सा बताया। कोई उन्हें अपनी बेटी बता रहा था, कोई बहन, कोई भतीजी। एक ट्रक चालक की बेटी के आईएएस बनने की कहानी अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बनी। हर कोई परिवार के संघर्ष को सलाम कर रहा था और हर संभव मदद का भरोसा दे रहा था।
लेकिन खुशियों का यह कारवां महज एक दिन ही चल सका। अगले ही दिन यह स्पष्ट हो गया कि 708वीं रैंक पर चयनित फैरुज फातिमा उत्तराखंड के पिरान कलियर की नहीं, बल्कि केरल की निवासी हैं। नाम की समानता के कारण पैदा हुआ भ्रम दूर होते ही मानो पूरा माहौल बदल गया।
जो लोग कल तक कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, उन्होंने एक-एक कर मुंह फेर लिया। बधाइयों की जगह तानों ने ले ली। रिश्तेदारों की भीड़ गायब हो गई। जिन लोगों ने अपनापन दिखाया था, वही दूरी बनाने लगे। गांव की गलियों में मजाक बनने लगा। छोटे-छोटे बच्चे तक परिवार पर तंज कसने लगे।
फैरुज फातिमा के पिता इकबाल अहमद बताते हैं कि उन्होंने पूरी जिंदगी ट्रक चलाकर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। परिवार पहले ही कई बड़े सदमे झेल चुका है। उनका इकलौता बेटा सड़क हादसे में दुनिया छोड़ गया, एक बेटी का भी निधन हो चुका है। अब केवल फैरुज ही उनकी उम्मीदों का सहारा है।
वह बताते हैं कि जब आईएएस बनने की खबर मिली तो लगा कि बरसों की मेहनत रंग ले आई है, लेकिन जब नामों की गड़बड़ी सामने आई तो ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया ने उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया हो। आंखों में आंसू लिए वह कहते हैं कि जिन लोगों ने मदद के बड़े-बड़े वादे किए थे, वे सब गायब हो गए। रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया। केवल उनकी बहन नसीमा ही मुश्किल वक्त में उनके साथ खड़ी रही, जिसने घर में खाने तक का इंतजाम किया।
इकबाल अहमद बताते हैं कि लगातार मानसिक तनाव, तानों और सामाजिक उपेक्षा ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। इसी सदमे के बीच उन्हें हार्ट अटैक आया। आर्थिक हालात इतने खराब थे कि इलाज और दवाइयों तक के लिए पैसे नहीं थे। बाद में एक युवक ने लोगों से सहयोग जुटाकर उनके इलाज की व्यवस्था कराई। वह कहते हैं कि आज भी उन्हें अपनी बेटी की मेहनत पर पूरा भरोसा है। फैरुज दिल्ली में नौकरी करते हुए अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा रही है और उन्हें यकीन है कि एक दिन वह अपनी मंजिल जरूर हासिल करेगी।
उधर फैरुज फातिमा की मां गुलबहार की आवाज हर वाक्य के साथ भर्रा जाती है। वह कहती हैं कि इस घटना के बाद समाज ने जैसे उनसे रिश्ता ही खत्म कर लिया। बाहर निकलते ही ताने सुनने पड़ते हैं। बच्चे तक चिढ़ाते हैं—”कहां हैं डीएम साहिबा… हमारी मालाओं के पैसे दे दो…”।
वह आरोप लगाती हैं कि इन तानों ने उनके पति को बीमार कर दिया। कई बार घर में दवाइयों के पैसे तक नहीं रहे। कई दिनों तक रसोई में चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो गया। वह रोते हुए कहती हैं कि कभी-कभी जिंदगी से ही हार जाने का मन करता है, लेकिन फिर बेटी की मेहनत और उसके सपनों का ख्याल उन्हें संभाल लेता है।
यह कहानी सिर्फ फैरुज फातिमा के परिवार की नहीं है, बल्कि उस समाज का आईना भी है जो इंसान की इज्जत उसके संघर्ष से नहीं, उसकी सफलता से करता है। कामयाबी दिखे तो लोग रिश्तेदार बन जाते हैं, लेकिन मुश्किल वक्त आए तो पहचानने से भी इनकार कर देते हैं। फूल चढ़ाने में सबसे आगे रहने वाले लोग अक्सर आंसू पोंछने के समय सबसे पीछे खड़े दिखाई देते हैं।
आखिर सवाल यह है कि यदि इस पूरे घटनाक्रम में परिवार की कोई व्यक्तिगत साजिश साबित नहीं हुई, तो फिर उन्हें उम्रकैद जैसी सामाजिक सजा क्यों दी जा रही है? क्या एक नाम के भ्रम की कीमत किसी बूढ़े बाप की बीमारी, एक मां के आंसू और एक परिवार की भूख हो सकती है? क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो चुका है कि किसी के टूटे हुए सपनों पर भी ताने कसने में उसे शर्म नहीं आती?
शायद वक्त का सबसे बड़ा सबक यही है—कामयाबी पर तालियां बजाना आसान है, लेकिन किसी टूटे हुए इंसान का हाथ थामना ही असली इंसानियत है। रिश्ते खुशियों में नहीं, मुश्किल वक्त में पहचाने जाते हैं।



