“चुनावी साल में “बॉक्स ऑफिस” पर फिल्म हिट कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर, रोज अदा करने पड़ रहे नए किरदार..
हाइप्रोफाइल मामलों में "धाकड़ प्रोडक्शन" के "बड़े राइटर" लिख रहे पटकथा, नामी डायरेक्टर बांट रहे रोल, जनता ख़ूब समझ रही झोल..
पंच👊नामा ब्यूरो
सुल्तान, हरिद्वार: चुनावी साल आते ही प्रदेश का माहौल किसी मल्टीस्टारर फिल्म से कम नजर नहीं आ रहा। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी अपने-अपने चुनावी शो की तैयारियों में जुटे हैं। लेकिन सबसे मुश्किल रोल पुलिस के हिस्से में आया है। कानून-व्यवस्था संभालने के साथ-साथ उसे हर दूसरे दिन किसी नई “स्क्रिप्ट” का किरदार भी निभाना पड़ रहा है।
निहंग सिखों के बवाल से लेकर टिहरी के केतन हत्याकांड जैसे संवेदनशील मामलों तक, हर हाई-प्रोफाइल घटनाक्रम में ऐसा लगता है मानो किसी आलीशान दफ्तर में बैठे “धाकड़ प्रोडक्शन” के बड़े राइटर पहले पटकथा लिखते हैं और फिर नामी डायरेक्टर जिले-दर-जिले कलाकारों की कास्टिंग कर देते हैं।
जिसके बाद सड़कें शूटिंग सेट में बदल जाती हैं और वायरलेस पर “लाइट… कैमरा… एक्शन…” शुरू हो जाता है। हर कलाकार की कोशिश रहती है कि उसकी प्रस्तुति ऐसी हो कि चुनावी बॉक्स ऑफिस पर फिल्म सुपरहिट साबित हो जाए।
बड़े अधिकारी… मंझे हुए कलाकार……
पुलिस महकमे में कुछ बड़े अधिकारी ऐसे भी हैं, जिनकी अदाकारी देखकर नए कलाकार भी दंग रह जाते हैं। चेहरे के भाव, संवाद और टाइमिंग इतनी सधी हुई कि मातहत भी समझ नहीं पाते कि सामने असली घटनाक्रम चल रहा है या किसी चुनावी फिल्म की शूटिंग। वहीं कई अधिकारी और कर्मचारी ऐसे हैं जिन्हें अभिनय में न रुचि है और न महारत, लेकिन स्क्रिप्ट में नाम आ जाने के बाद मजबूरी में किरदार निभाना पड़ता है।
“कट… रीटेक… फिर एक्शन”…..
सूत्र बताते हैं कि कई बार पहला सीन उम्मीद के मुताबिक नहीं बैठता तो पटकथा में हल्का बदलाव कर दोबारा शूटिंग शुरू हो जाती है। किरदार वही रहते हैं, संवाद बदल जाते हैं। कैमरे की जगह मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग करते हैं और कुछ ही मिनटों में पूरा सीन सोशल मीडिया पर रिलीज हो जाता है। फिर शुरू होता है दर्शकों का रिव्यू।
को-एक्टर की एंट्री से बिगड़ गया सीन…. चार दिन पहले एक चर्चित मामले में मुख्य कलाकार के साथ एक ऐसे को-एक्टर की एंट्री हो गई, जो बड़े-बड़े “प्रोजेक्ट” पूरे करने के लिए चर्चित हैं। कहते हैं कि जरूरत पड़े तो पैदल चलने से लेकर हेलीकॉप्टर में उड़ान भरने तक से परहेज नहीं करते।
लेकिन इस बार कैमरे में उनकी मौजूदगी ही पूरी फिल्म की सबसे बड़ी “कंटिन्यूटी मिस्टेक” बन गई। बस फिर क्या था, दर्शकों ने कहानी का झोल पकड़ लिया और सोशल मीडिया पर रिव्यू शुरू हो गए।
जनता अब सिर्फ दर्शक नहीं, फिल्म क्रिटिक भी है….
शायद स्क्रिप्ट लिखने वालों को अब भी लगता हो कि दर्शक पहले जैसे हैं। लेकिन अब जनता हर सीन को स्लो मोशन में देखती है, हर संवाद का मतलब निकालती है और हर किरदार का पुराना रिकॉर्ड भी याद रखती है। इसलिए ओवरएक्टिंग हो या कमजोर पटकथा, दर्शक तुरंत पकड़ लेते हैं।
क्लाइमैक्स अभी बाकी है…
फिलहाल चुनावी फिल्म की शूटिंग जारी है। नए-नए एपिसोड रिलीज हो रहे हैं और कलाकार पूरे मनोयोग से अपने किरदार निभा रहे हैं। लेकिन इस फिल्म का असली क्लाइमैक्स किसी थिएटर में नहीं, बल्कि मतदान केंद्रों पर लिखा जाएगा। क्योंकि आखिरी फैसला निर्देशक नहीं, दर्शक ही सुनाएंगे।



