“अखाड़ा परिषद की राजनीति में नई हलचल: बाबा हठयोगी ने दिया इस्तीफ़ा, बैरागी संतों में उपेक्षा को लेकर उबाल, उठे सवाल..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार। अखाड़ों की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। बैरागी संप्रदाय के प्रमुख संत बाबा हठयोगी ने अखिल भारतीय वैष्णव अखाड़ा परिषद और दिगम्बर अखाड़े के प्रतिनिधि पद से इस्तीफा देकर संत समाज में नई बहस छेड़ दी है। हालांकि बाबा हठयोगी ने त्यागपत्र को व्यक्तिगत निर्णय बताया है, लेकिन संतों के बीच इसे हाल ही में घोषित अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की नई कार्यकारिणी में हरिद्वार और ऋषिकेश के बैरागी संतों की उपेक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
बाबा हठयोगी के इस्तीफे की खबर सामने आते ही बैरागी संतों और महंतों के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कई संतों का कहना है कि अखाड़ा परिषद के चुनाव से पहले सहमति बनी थी कि इस बार परिषद का अध्यक्ष बैरागी अखाड़ों से और महामंत्री संन्यासी अखाड़ों से होगा, लेकिन नई कार्यकारिणी में यह फार्मूला पूरी तरह बदल गया। अध्यक्ष पद संन्यासी अखाड़े के हिस्से में चला गया, जबकि उत्तराखंड के बैरागी संतों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा गया।
नाम न छापने की शर्त पर कई संतों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि परिषद में प्रवक्ता और मीडिया प्रभारी जैसे अहम पद भी बाहरी राज्यों के संतों को सौंप दिए गए। उनका आरोप है कि जिन संतों को जिम्मेदारी मिली है, उन्हें परिषद की कार्यप्रणाली का पर्याप्त अनुभव तक नहीं है, जबकि वर्षों से संगठन में सक्रिय उत्तराखंड के संतों की अनदेखी कर दी गई।
बाबा हठयोगी लंबे समय से अखाड़ों की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। श्रीमहंत ज्ञानदास महाराज की अध्यक्षता वाली अखाड़ा परिषद में वे राष्ट्रीय प्रवक्ता का दायित्व निभा चुके हैं। वहीं, प्रयागराज महाकुंभ के दौरान विवाद के बाद गठित वैष्णव अखाड़ा परिषद में श्रीमहंत राजेंद्रदास महाराज के नेतृत्व में उन्हें महामंत्री बनाया गया था। दिगम्बर अखाड़े का प्रतिनिधित्व भी अधिकांश बैठकों में वही करते रहे। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल एक पद छोड़ने का मामला नहीं, बल्कि बैरागी संतों की नाराजगी का संकेत माना जा रहा है।
इस्तीफे के बाद बाबा हठयोगी ने इतना ही कहा कि उन्होंने त्यागपत्र देकर सभी जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त कर लिया है। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से किसी पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन संत समाज इसे मौन विरोध के रूप में देख रहा है। संतों का कहना है कि यदि बैरागी संप्रदाय के वरिष्ठ और अनुभवी संतों को लगातार दरकिनार किया गया तो इसका असर अखाड़ा परिषद की एकजुटता पर पड़ सकता है। चर्चा यह भी है कि पहले से दो धड़ों में बंटी परिषद में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में नए राजनीतिक समीकरण बना सकता है। ऐसे में बाबा हठयोगी का इस्तीफा केवल एक औपचारिक फैसला नहीं, बल्कि अखाड़ा परिषद की अंदरूनी राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।



