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“दबाव बनाम कानून: अखाड़े की संपत्ति पर अवैध निर्माण बना प्रशासन की परीक्षा..!!

तीन बार सीलिंग, मुकदमा दर्ज, फिर भी दबाव का प्रयास, एचआरडीए झुका तो आम अवैध निर्माण पर कैसे होगी कार्रवाई.?

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पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार: धर्मनगरी में अखाड़े की संपत्ति पर चल रहे अवैध निर्माण का मामला अब पूरी तरह “दबाव बनाम प्रशासनिक सख्ती” की कसौटी बन गया है। बिना स्वीकृत नक्शे और आवश्यक एनओसी के निर्माण को लेकर जहां एचआरडीए और प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए तीन बार सीलिंग की, वहीं दूसरी ओर लगातार दबाव बनाकर इस कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिशें सामने आ रही हैं।सूत्रों के अनुसार, निर्माण पर रोक लगते ही प्रभाव का इस्तेमाल कर अधिकारियों को नरमी बरतने के लिए बाध्य करने की कोशिश की गई। सीलिंग के बावजूद काम दोबारा शुरू कराने के प्रयास इस दबाव की रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। मामला तूल पकड़ने पर विभागीय स्तर पर मुकदमा दर्ज कराना पड़ा, जो यह दिखाता है कि एचआरडीए ने शुरुआती दबावों के बावजूद कार्रवाई से पीछे हटने से इनकार किया।बताया जा रहा है कि दबाव बनाने के लिए केवल प्रशासनिक स्तर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी माहौल बनाने की कोशिश हुई। एचआरडीए कार्यालय परिसर में धरना-प्रदर्शन कर अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास किया गया, ताकि कार्रवाई को कमजोर किया जा सके। जब यह तरीका कारगर नहीं हुआ, तो व्यापारियों को साथ लेकर एक तरह का जनदबाव तैयार करने की रणनीति अपनाई गई। उन्हें यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि निर्माण को लेकर सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है।इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—अगर एचआरडीए और प्रशासन सत्ताधारी नेताओं या प्रभावशाली लोगों के दबाव के आगे झुकते हैं, तो फिर आम लोगों द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माण पर सख्ती कैसे लागू हो पाएगी? कानून का समान रूप से पालन तभी संभव है, जब कार्रवाई बिना किसी दबाव के और निष्पक्ष तरीके से की जाए।फिलहाल, एचआरडीए और प्रशासन के सामने चुनौती केवल एक अवैध निर्माण को रोकने की नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और निष्पक्षता को बनाए रखने की भी है। अब देखना यह होगा कि दबाव की इन परतों के बीच नियमों की जीत होती है या फिर प्रभाव की।

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