हरिद्वार

“मामू” अब नहीं रहे… कलियर की गलियों में गूंज रही है बस उनकी ख़िदमत की दास्तां..

सर पर कूड़ा उठाने वाले उस फकीर ने सिखाया— इबादत सिर्फ सजदों से नहीं, इंसानों की सेवा से भी होती है..

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पंच👊नामा
पिरान कलियर: कहते हैं कि ख़िदमत में ऐसी ताकत होती है, जो इंसान को सीधे खुदा के करीब ले जाती है… और धर्मनगरी पिरान कलियर में अगर इस बात की कोई मिसाल थी, तो वो थे मुहम्मद मोबीन अलमरूफ़ “मामू”। वही मामू… जिन्हें यहां बच्चा-बूढ़ा सिर्फ “मामू” कहकर पुकारता था। आज वही मामू इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुखसत हो गए… और उनके जाने की खबर ने पिरान कलियर की फिजाओं को ग़मगीन कर दिया।कानपुर स्थित अपने निजी आवास पर अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। जैसे ही यह खबर पिरान कलियर पहुंची, मानो दरगाह की गलियां उदास हो गईं, नालियों के किनारे झाड़ू लगाने वाले हाथ थम गए, और उन आंखों से आंसू छलक पड़े, जिन्होंने सालों तक मामू को सिर्फ सफाई करते नहीं, बल्कि लोगों की टूटी हुई ज़िंदगियों को संवारते देखा था।मामू की जिंदगी किसी रूहानी सफर से कम नहीं थी। करीब वर्ष 2012 में वह अपनी बीमार बच्ची को लेकर कानपुर से पिरान कलियर आए थे। हर तरफ मायूसी थी, लेकिन दरगाह से जुड़ी उम्मीद उन्हें यहां खींच लाई। इसी दौरान उनकी मुलाकात पूर्व नायब सज्जादानशीन मरहूम शिम्मी मियां से हुई। शिम्मी मियां ने उनसे कहा कि दरगाह की ख़िदमत करो, नालियों की सफाई करो… शायद इसी ख़िदमत में शिफा हो। कहते हैं कि उस ख़िदमत की बरकत से उनकी बच्ची को राहत मिली। बस उसी दिन से मामू ने अपनी जिंदगी इंसानियत और ख़िदमत के नाम कर दी।धीरे-धीरे मामू अकेले नहीं रहे… उनके साथ लोग जुड़ते चले गए। कोई बिहार से आया, कोई दिल्ली से, कोई पंजाब, बंगाल, झारखंड, हरियाणा, रुद्रपुर, मुरादाबाद, लखनऊ या शाहजहांपुर से। कोई टूटा हुआ था, कोई बीमारी से परेशान, कोई जिंदगी से हार चुका था। मामू सबको अपने साथ लगा लेते।आज यह कारवां करीब 200 लोगों तक पहुंच चुका है, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। कई परिवार तो पूरी तरह पिरान कलियर में ही बस गए। मामू टीम में 3 दर्जन से ज्यादा गैर मुस्लिम सदस्य भी हैं, जो बिना किसी भेदभाव के इस ख़िदमत का हिस्सा बने हुए है। यहां मजहब नहीं, सिर्फ इंसानियत चलती थी।टीम के सदस्यों के मुताबिक, “मामू कहते थे कि गंदगी साफ करना सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि दिलों को साफ करने जैसा काम है। ”यही वजह थी कि जहां लोग गंदगी देखकर रास्ता बदल लेते थे, वहां मामू और उनकी टीम उतर जाती थी। बदबूदार नालियां, कूड़े के ढेर, सड़क किनारे पसरी गंदगी… यही उनकी इबादतगाह थी।पिरान कलियर की सड़कों पर सिर पर कूड़ा उठाए अगर कोई टोली दिखती थी, तो लोग समझ जाते थे — “मामू टीम आ गई… ”बिना तनख्वाह, बिना लालच, बिना किसी दिखावे के… सिर्फ ख़िदमत। बताया जाता है कि दरगाह दफ्तर तक को जब कहीं सफाई की जरूरत होती, तो बेझिझक “मामू टीम” को आवाज दी जाती और काम हो जाता। रहने और खाने का इंतजाम सज्जादानशीन की कोठी और लंगर से होता था। लेकिन शायद मामू और उनकी टीम के लिए सबसे बड़ी दौलत लोगों की दुआएं थीं।मामू अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी 5 बेटियां और 3 बेटे हैं, जिनमें दो बेटियों और एक बेटे की शादी हो चुकी है। दिल को और ज्यादा नम कर देने वाली बात यह है कि अभी हाल ही में मामू ने अपनी एक बेटी की शादी भी पिरान कलियर में ही की थी। जिस दरगाह और जिस धरती को उन्होंने अपनी जिंदगी दी, उसी धरती से उन्होंने अपनी बेटी को रुखसत किया था। किसे पता था कि कुछ ही दिनों बाद वही कलियर, मामू को आखिरी विदाई देने की तैयारी करेगा…साहिबजादा शाह यावर मियां ने मामू के इंतकाल की पुष्टि करते हुए कहा कि “मामू का दरगाह से लगाव और उनकी ख़िदमत को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके शव को पिरान कलियर लाने की तैयारी की जा रही है। ”आज मामू भले इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी जिंदगी यह साबित कर गई कि सच्ची इबादत सिर्फ सजदों में नहीं, बल्कि इंसानियत की सेवा में होती है। उन्होंने दिखा दिया कि “नर सेवा ही नारायण सेवा है” और ख़िदमत से बढ़कर कोई दौलत नहीं।

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