“मजहब की सीमाओं से ऊपर उठकर निभाया फर्ज, हिंदू सहयोगियों ने डॉ. कुर्बान को दी अंतिम विदाई..
15 वर्षों तक निश्शुल्क चिकित्सा सेवा से लोगों की सेवा करने वाले डॉ. कुर्बान अली को ज्वालापुर कब्रिस्तान में किया सुपुर्द-ए-खाक..

पंच👊नामा-ब्यूरो
हरिद्वार; इंसानियत की कोई जाति या मजहब नहीं होता। इसका जीवंत उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब ऋषिकेश के शीशम झाड़ी स्थित स्वामी दयानंद आश्रम में करीब 15 वर्षों तक निश्शुल्क चिकित्सा सेवा करने वाले होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. कुर्बान अली कपासी के निधन के बाद उनके हिंदू सहयोगी उनकी अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए आगे आए। उन्होंने ऋषिकेश से उनके पार्थिव शरीर को हरिद्वार लाकर ज्वालापुर स्थित वक्फ कब्रिस्तान, सुभाष नगर में पूरे सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक कराया।
मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. कुर्बान अली कपासी, पुत्र स्वर्गीय ताहिर अली कपासी, ने विवाह नहीं किया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन जरूरतमंदों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। स्वामी दयानंद आश्रम में होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में वह वर्षों तक लोगों का निश्शुल्क उपचार करते रहे। सेवा के इसी भाव ने उन्हें आश्रम से जुड़े लोगों और स्थानीय लोगों के बीच अलग पहचान दिलाई।
शनिवार को उनके निधन के बाद उनके सहयोगियों के सामने उनकी अंतिम इच्छा को सम्मानपूर्वक पूरा करने की जिम्मेदारी थी। डॉ. कुर्बान की इच्छा थी कि निधन के बाद उन्हें उनके धर्म के अनुसार दफनाया जाए। आश्रम से जुड़े हिंदू सहयोगियों ने इसे केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपने साथी के प्रति अंतिम कर्तव्य माना। ऋषिकेश के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. बवेजा के साथ आश्रम से जुड़े वीरेंद्र यादव, कंचन यादव, प्रियंका यादव, वंदना यादव, जगदीश यादव, हरिओम यादव, प्रद्युम्न यादव और वीर बहादुर यादव ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभी ने मिलकर डॉ. कुर्बान के पार्थिव शरीर को ऋषिकेश से हरिद्वार पहुंचाया और ज्वालापुर स्थित वक्फ कब्रिस्तान, सुभाष नगर में पूरे सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक कराया।
अंतिम विदाई का यह दृश्य भावुक कर देने वाला था। जिन लोगों के साथ डॉ. कुर्बान ने वर्षों तक सेवा और सहयोग का रिश्ता निभाया, वही लोग उनकी अंतिम यात्रा में उनके साथ खड़े नजर आए। यह दृश्य बताता है कि सच्चे रिश्ते मजहब की सीमाओं से कहीं ऊपर होते हैं। डॉ. कुर्बान अली कपासी की जिंदगी और उनकी अंतिम विदाई समाज को यही संदेश देती है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। करीब 15 वर्षों तक निशुल्क चिकित्सा सेवा के जरिए लोगों की जिंदगी में राहत पहुंचाने वाले डॉ. कुर्बान अब दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके सेवाभाव और उनके हिंदू सहयोगियों की ओर से निभाई गई अंतिम जिम्मेदारी की यह मिसाल लंबे समय तक याद की जाएगी।
कब्रिस्तान समिति अध्यक्ष बोले, इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं……
वक्फ कब्रिस्तान समिति के अध्यक्ष पार्षद अहसान अंसारी एडवोकेट ने कहा कि डॉ. कुर्बान अली कपासी की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके हिंदू सहयोगियों का उन्हें ऋषिकेश से हरिद्वार लाकर सुपुर्द-ए-खाक कराना आपसी भाईचारे और इंसानियत की बेहद खूबसूरत मिसाल है। उन्होंने कहा कि डॉ. कुर्बान ने अपना जीवन जरूरतमंदों की सेवा में लगा दिया। उनकी अंतिम विदाई के समय जिस तरह उनके सहयोगी साथ खड़े रहे, उससे यह संदेश जाता है कि इंसानियत और रिश्ते मजहब की दीवारों से कहीं ऊपर होते हैं। ऐसे उदाहरण समाज में आपसी प्रेम, सौहार्द और विश्वास को मजबूत करते हैं।



